Bhagavad Gita is a conversation between Lord Krishna and Warrior Arjun. The Gita is Lord's guidance to humanity to be joyful and attain moksha (salvation) which is the ultimate freedom from all the polarities of the physical world. He shows many paths which can be adopted based on one's nature and conditioning. This podcast is an attempt to interpret the Gita using the context of present times. Siva Prasad is an Indian Administrative Service (IAS) officer. This podcast is the result of understanding the Gita by observing self and lives of people for more than 25 years, being in public life.

श्रीकृष्ण आसुरी प्रवृत्ति वालों का विस्तार से वर्णन करते हुए कहते हैं,"ऐसे अनेक प्रकार से भ्रमित मन वाले, मोह के जाल में उलझकर तथा विषय-भोगों में आसक्त होकर घोर नरक में गिरते हैं (16.16)। ऐसे अभिमानी और हठी लोग, संपत्ति के मद और अहंकार से मदमस्त होकर, शास्त्रों के विधि-विधानों का आदर न करते हुए पाखंडपूर्वक केवल नाम मात्र के लिए यज्ञ करते हैं (16.17)। अहंकार (मैं कर्ता हूँ), बल, दम्भ, कामना और क्रोध से अंधे होकर, ये द्वेषी पुरुष अपने भीतर तथा अन्य सभी प्राणियों में निवास करने वाले मुझ अन्तर्यामी को तुच्छ समझते हैं (16.18)। इन द्वेष करनेवाले पापाचारी और क्रूरकर्मी नराधमों को मैं संसार में बार-बार आसुरी योनियों में डालता हूँ (16.19)। ये अज्ञानी आत्माएँ आसुरी योनियों में बार-बार जन्म लेती हैं। हे अर्जुन, वे मूढ़ मुझे प्राप्त न कर पाने पर, धीरे-धीरे आसुरी योनियों को और उससे भी अति अधम गति को ही प्राप्त होते हैं" (16.20)।श्रीकृष्ण ने पहले कहा था कि वे सभी जीवों के प्रति समान भाव रखते हैं। उनके लिए न तो कोई द्वेष्य है और न ही कोई प्रिय है (9.29)। लेकिन उपरोक्त श्लोक संकेत करते हैं कि वे आसुरी प्रवृत्ति वालों से घृणा करते हैं और इसलिए उन्हें अधम योनियों में रखते हैं।यह प्रत्यक्ष विरोधाभास हमारे इस भ्रम से उत्पन्न होता है कि श्रीकृष्ण (परमात्माका नाम व्यक्ति की आस्था के आधार पर भिन्न हो सकता है) एक व्यक्ति हैं, जबकि वे वास्तव में स्वयं अस्तित्व हैं। वे केवल उन नियमों कावर्णन कर रहे हैं जो अस्तित्व को संचालित करते हैं। यह गुरुत्वाकर्षण के नियम की तरह है जहाँ ऊँचाई से कूदने पर गिरना अनिवार्य है। श्रीकृष्ण ने पहले इसका वर्णन इस प्रकार किया था, "व्यक्ति जिस भी प्रकार से मुझे भजते हैं, मैं उसी प्रकार से उन्हें प्राप्त होता हूँ" (4.11)। जब कोई आसुरी मार्ग अपनाता है, तो सम्भवतः समय के साथ, अस्तित्व स्वतः ही आसुरी ढंग से प्रतिक्रिया करता है।हमारा भौतिक शरीर विकास, उत्कृष्ट शिल्पकला और सुसंगति के संदर्भ में अस्तित्व की अनन्त उदारता का सर्वोत्तम उदाहरण है। यह हमें जो कुछ भी दिया गया है, उसके लिए कृतज्ञ होने के बारे में है, न कि इंद्रिय तृप्ति के लिए अस्तित्व से कुछ हड़पने के लिए।

श्रीकृष्ण कहते हैं कि आसुरी प्रवृत्ति वाला व्यक्ति सोचता है, “मैंने आज यह प्राप्त कर लिया है और अब इस इच्छा को पूरा करूँगा। यह सब मेरा है और कल मुझे इससे भी अधिक मिलेगा (16.13)। मैंने इस शत्रु को मार डाला है और अन्य शत्रुओं को भी मार डालूँगा। मैं मनुष्यों में शासक हूँ; मैं भोगी हूँ, मैं पूर्ण, शक्तिशाली और सुखी हूँ (16.14)। मैं धनवान और कुलीन हूँ; मेरे समान और कौन है? मैं त्याग करूँगा, मैं दान करूँगा, मैं आनंद मनाऊँगा।" इस प्रकार, आसुरी प्रवृत्ति वाला व्यक्ति अज्ञानता से मोहित हो जाते हैं (16.15)। आज की दुनिया में, इसे अक्सर 'सफलता' समझ लिया जाता है।यह अहंकार की भाषा है जो दूसरों से तुलना करने से पनपती है। आसुरी व्यक्ति अहंकार से ग्रसित होता है, जो दूसरों की तुलना में अधिक धन अर्जित करने में सफलता मिलने पर, शत्रुओं के परास्त होने पर, या उन्नति के शिखर पर पहुँचने पर शासक जैसा अनुभव करता है। ऐसा होने पर अहंकार में वृद्धि होती है।तुलना इच्छाओं को प्रेरित करती है, जिसमें संचय और इंद्रिय तृप्ति की इच्छा भी शामिल हैं। लेकिन इंद्रिय तृप्ति का कोई अंत नहीं है और श्रीकृष्ण इसे अज्ञानजनित मोह कहते हैं। श्रीकृष्ण ने अज्ञान का नाश करने के लिए ज्ञान की तलवार का उपयोग करने के लिए कहा था (4.41) और कहा था कि इस संसार में ज्ञान से अधिक पवित्र कुछ भी नहीं है। समय आने पर, जिसने योग सिद्ध कर लिया है, वह इसे स्वयं में पा लेता है (4.38)। इसकी कुंजी है सबूरी (धैर्य) के साथ श्रद्धा।हमारी वर्तमान स्थिति चाहे जो भी हो, ज्ञान योग के अभ्यास से हम उपयुक्त समय में ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। सार यह है कि जब हम तुलना करते हैं तो स्वयं का अवलोकन करें; एक अच्छे विद्यार्थी की तरह इन प्रवृत्तियों पर प्रश्न करें (4.34), ताकि हम स्वयं को बेहतर बना सकें। श्रीकृष्ण ने पहले आश्वासन दिया था कि योग के अभ्यास में छोटे कदम भी परिणाम देते हैं (2.40)।

श्रीकृष्ण आसुरी स्वभाव वालों के बारे में आगे कहते हैं, "यह मानते हुए कि यह सारा संसार शारीरिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए है, ऐसे लोग मृत्युपर्यंत सांसारिक चिंताओं में डूबे रहते हैं (16.11)। सैकड़ों इच्छाओं, काम और क्रोध के बन्धन में बंधे हुए, वे अपनी इंद्रियों की तृप्ति के लिए अन्यायपूर्ण तरीकों से धन संचय करने का प्रयास करते हैं" (16.12)। जब इच्छाएँ पूरी नहीं होतीं, तो क्रोध स्वाभाविक है, इस प्रकार वे साथ-साथ चलते हैं। इसीलिए इंद्रियों पर नियंत्रण भगवद्गीता के प्रमुख उपदेशों में से एक है।जब कोई संचय को लक्ष्य बनाता है, तो उसकी प्रवृत्ति उसे प्राप्त करने की ओर अपनी सारी ऊर्जा लगाने की होती है। इस मार्ग पर, व्यक्ति उक्त लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अपनाए गए सभी साधनों को उचित ठहराने की कोशिश करता है, चाहे वे साधन नैतिक हों या अनैतिक। इस प्रक्रिया में दूसरों को हड़पना शामिल है - यह संपत्ति या अच्छे काम का श्रेय हो सकता है; यह बाजार में हिस्सेदारी हड़पना या मन में जगह बनाना हो सकता है जिसे स्वार्थी उद्देश्यों के लिए 'दूसरों को प्रभावित करना' कहा जाता है जैसा कि सामाजिक संचार माध्यम (सोशल मीडिया) पर किया जाता है। श्रीकृष्ण जमाखोरी को हतोत्साहित करते हैं और जमा करने वालों को चोर कहते हैं (3.12)। वह हमें देने और लेने के प्राकृतिक चक्र का हिस्सा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। उन्होंने जल चक्र का उदाहरण दिया जिसमें वर्षा और वाष्पीकरण के निःस्वार्थ कर्म (यज्ञ) शामिल हैं।इसका मतलब अपने पेशे या कर्मों का त्याग करना नहीं है। श्रीकृष्ण ने पहले हमें कर्मों का त्याग करने के लिए नहीं, बल्कि घृणा का त्याग करने के लिए कहा था। एक बार घृणा का त्याग हो जाए, तो उसका ध्रुवीय विपरीत, यानी आसक्ति या हड़पना, स्वतः ही गायब हो जाएगा।विकास और सुधार प्रकृति का अभिन्न अंग हैं। इस प्रक्रिया में, बेहतर प्रजातियाँ विकसित होती हैं; जीवन की गुणवत्ता समय के साथ बेहतर होती जाती है। सार यह है कि संचय में लिप्त होने के बजाय प्रवाह के साथ आगे बढ़ें। संचय के प्रति यह आसक्ति ही वह बन्धन है जिसे श्रीकृष्ण ने आसुरी व्यक्ति की पहचान बताया है।

श्रीकृष्ण ने अस्तित्व की व्याख्या करते हुए कहा कि यह प्रकृति और पुरुष का संयोग है, जो दोनों अनादि हैं। गुण और विकार प्रकृति से उत्पन्नहोते हैं (13.20)। जबकि प्रकृति कारण और प्रभाव के लिए जिम्मेदार है, पुरुष उन्हें सुख और दुःख के द्वंद्वों के रूप में अनुभव करता है (13.21)। श्रीकृष्ण ने आगे स्पष्ट किया कि वह नाशवान प्रकृति से अतीत हैंऔर अविनाशी पुरुष से भी उत्तम हैं, इसलिए उन्हें पुरुषोत्तम (परम पुरुष या परमात्मा) कहा जाता है (15.18)। यह पुनरावृत्ति हमें निम्नलिखित श्लोकों को समझने में मदद करेगी।श्रीकृष्ण कहते हैं, “आसुरी स्वभाव वाले लोग कर्म और अकर्म में भेद नहीं कर पाते। उनमें न तो पवित्रता होती है, न आचरण, न सत्य (16.7)। वे कहते हैं कि संसार परम सत्य से रहित है, आधारहीन है, प्रभु से रहित है।यह संसार कामवासना से (स्त्री-पुरुष के) पारस्परिक मिलन से उत्पन्नहुआ है" (16.8)। मूलतः, यह प्रकृति के स्तर पर जीवन जीना है, जहाँ कारण और प्रभाव का प्रभुत्व है; जहाँ तर्क ही हमारे अनुभव की हर चीज को परिभाषित करता है।अगला प्रश्न यह उठता है कि नाशवान प्रकृति के स्तर पर कार्य करने वाले व्यक्ति का आचरण कैसा होगा। इस संदर्भ में श्रीकृष्ण कहते हैं, “ऐसे विचारों को धारण करके, ये पथ भ्रष्ट आत्माएँ, अल्प बुद्धि और क्रूर कर्मों के साथ, संसार के शत्रु के रूप में इसके विनाश का कारण बनती हैं(16.9)। अतृप्त कामनाओं को धारण किए, पाखंड, अभिमान और अहंकार से युक्त, मोहवश बुरे विचारों से युक्त, ये अशुद्ध संकल्प से कार्य करते हैं (16.10)।संक्षेप में, आसुरी स्वभाव वाले लोग पुरुषोत्तम को समझे बिना प्रकृति के कारण और प्रभाव के स्तर पर जीते हैं। सृष्टि के लिए नर-नारी के मिलन का रूपक तार्किक है। इसी प्रकार, हमारे आस-पास दिखाई देनेवाले कई कार्य और विचार भी इसी तार्किक श्रेणी में आते हैं। ध्यान देने योग्य बात यह है कि एक माँ के निःस्वार्थ प्रेम का शुद्ध आनंद तर्क से परे है। यह तर्क के बन्धन से बिना शर्त प्यार (निःस्वार्थ प्रेम) की यात्रा है।

श्रीकृष्ण कहते हैं, “तेज (चरित्र का तेज), क्षमा, धैर्य, पवित्रता, शत्रुभाव का न होना और प्रतिष्ठा की इच्छा से मुक्त होना; ये सब दिव्य प्रवृत्ति से संपन्न लोगों के दैवीय गुण हैं (16.3)। दम्भ, अहंकार, अभिमान, क्रोध, कठोरता और अज्ञानता उस व्यक्ति के लक्षण हैं जो आसुरी प्रवृत्ति के साथ जन्म लेता है (16.4)। संसार में दो प्रकार के प्राणी हैं- एक वे जो दैवीय गुणों से सम्पन्न हैं और दूसरे वे जो आसुरी प्रवृत्ति के हैं (16.6)। दैवीय प्रकृति मोक्ष प्रदान करती है;जबकि आसुरी गुण निरंतर बन्धन की नियति का कारण होते हैं”(16.5)। चूँकि मुक्ति और बन्धन अनुभवजन्य हैं, इसलिए उनके बारे में कोई भी व्याख्या स्पष्टता प्रदान करने के बजाय भ्रम पैदा करेगी।फँसे हुए बंदर की कहानी हमें बन्धन और मुक्ति के बीच के द्वैत को समझने में मदद करेगी। एक संकरे मुँह वाले सुराही में कुछ मेवे रखे जाते हैं, जिसमें बंदर का हाथ मुश्किल से समा पाता है। बंदर सुराही के मुँह से अपना हाथ अंदर डालता है और मुट्ठी भर मेवे पकड़ लेता है। मुट्ठी भर जाने पर उसका आकार बढ़ जाता है, इसलिए वह सुराही से बाहर नहीं निकल पाता और बंदर सुराही से बंध जाता है। हालाँकि बंदर अपनी बंद मुट्ठी को सुराही से बाहर निकालने के लिए हर सम्भव प्रयास करता है, लेकिन जब तक उसे यह एहसास नहीं हो जाता कि जाल उसने खुद ही बिछाया है, तब तक वह मुक्त नहीं हो सकता।विभाजन और उससे उत्पन्न तुलनाएँ; अतीत में जीना या भविष्य से अपेक्षाएँ; धन, विलासिता, शक्ति, मित्रों, शत्रुओं, काम, शराब या यहाँ तक कि दैनिक दिनचर्या से लगाव, बंदर की मुट्ठी में बंद उन मेवों की तरह हैं जो हमें बाँधते हैं। जहाँ कुछ और बनने या कुछ हड़पने की इच्छा बन्धन है, वहीं स्वयं को विलीन कर अस्तित्व के साथ एकाकार हो जाना मुक्ति है।जीवन हमारे सामने विभिन्न परिस्थितियाँ प्रस्तुत करता है, परंतु जब हम उन्हें उसी प्रकार आत्मसात करना सीख जाते हैं जैसे सागर नदियों को अपने में समाहित कर लेता है (2.70), जहाँ हमारी प्रतिक्रियाएँ उन परिस्थितियों से अप्रभावित रहती हैं; वही वास्तविक मुक्ति है। इस अध्याय में श्रीकृष्ण द्वाराबताए गए पड़ाव हमारी मुक्ति के मार्ग पर हुई प्रगति को परखने के मार्गदर्शक संकेतक बन सकते हैं।

श्रीकृष्ण कहते हैं, “अहिंसा, सत्य, अक्रोध, त्याग, शान्ति, निन्दा न करना, सभी प्राणियों पर दया, लोभ से मुक्ति, नम्रता, विनयशीलता, स्थिरता ये सब दैवीय गुण हैं (16.2)। जबकि अहिंसा एक दिव्य गुण है, कुरुक्षेत्र का हिंसक युद्ध एक बड़ी बाधा है जिसे भगवद्गीता को समझने के लिए पार करने की आवश्यकताहै।सबसे पहले, इस विरोधाभास का उत्तर श्रीकृष्ण ने पहले ही दे दियाथा जब उन्होंने अर्जुन से कहा था कि यदि वह सुख-दुःख, लाभ-हानि और जीत-हार के बीच आंतरिक संतुलन बनाए रखते हुए युद्ध लड़ेगा तो उसे कोई पाप नहीं लगेगा (2.38)। यह आंतरिक संतुलन या समत्व, अहिंसा के अलावा और कुछ नहीं है। अक्रोध (क्रोध से मुक्ति), एक और दैवीय गुण है जो इस आंतरिक संतुलन का परिणाम है। दूसरी ओर, असंतुलन से उत्पन्न कोई भी कार्य हिंसा है।दूसरे, श्रीकृष्ण कहते हैं कि सर्वश्रेष्ठ योगी वह है जो दूसरों के प्रति सुख-दुःख में वैसा ही भाव रखता है जैसा वह स्वयं के लिए रखता है (6.32)। यह ईर्ष्या के बिना दूसरों के सुख को अपना सुख मानना है; यह परपीड़न या व्यंग्य के बिना दूसरों के दुःख को अपना दुःख मानना है। दूसरों के प्रति ऐसी भावना अहिंसा है। निंदा भी एक प्रकार की हिंसा है जो हम झूठे और अपमानजनक बयान देकर दूसरों पर करते हैं। इसीलिए श्रीकृष्ण ने निंदा न करने को एक दिव्य गुण के रूप में शामिल किया। त्याग का एक और दिव्य गुण घृणा का त्याग है (5.3)।श्रीकृष्ण ने पहले दूसरों को स्वयं में और स्वयं को दूसरों में देखने का मार्ग बताया था (6.29-6.30)। यह दर्शाता है कि हममें भी वे अवगुण हैं जिनकी हम दूसरों में आलोचना करते हैं और दूसरों में भी वे अच्छे गुण हैं जिनकी हम प्रशंसा करते हैं। इसे समझना ही सभी प्राणियों के प्रति करुणा और सौम्यता जैसे दिव्य गुणों को प्राप्त करना है।सत्य (सत्यवादिता) का अर्थ है अनुकूल और प्रतिकूल दोनों हीपरिस्थितियों में बिना किसी शर्त के सत्यवादी होना। यह गुण भी हमारेआंतरिक संतुलन की उपज है।

भगवद्गीता के सोलहवें अध्याय का शीर्षक ‘दैव-असुर सम्पद विभाग योग' है। इसका अर्थ है दैवी और आसुरी स्वभावों के बीच के भेद को समझकर परमात्मा से एकत्व की प्राप्ति करना। हममें से प्रत्येक व्यक्ति में अनेक गुण होते हैं, जिन्हें दैव (दैवी) और असुर (आसुरी) कहा जा सकता है। दैव वह आंतरिक यात्रा है जो परमात्मा की ओर ले जाती है, जबकि असुर प्रवृत्ति हमें उनसे दूर ले जाती है। श्रीकृष्ण ने ‘अभयं' (भय का आभाव) को दैवी गुणों में प्रथम बताया है (16.1)। यद्यपि अभयं का अर्थ सामान्यतः निर्भयता के रूप में किया जाताहै, किंतु उसका भावार्थ इससे कहीं अधिक गहन है।भगवद्गीता को समझने के लिए हमें हमेशा तीसरे विकल्प को ध्यान में रखना चाहिए। जैसे कि राग और विराग से परे की तीसरी अवस्था वीत-राग है। इसी तरह, आसक्ति और विरक्ति से परे की तीसरी अवस्था अनासक्ति है। हम आसक्ति/राग या विरक्ति/विराग के द्वंद्वों से भली-भाँति परिचित हैं, लेकिन तीसरी अवस्था तक पहुँचना एक चुनौती है। ऐसा ही 'अभय' भी है, जोभय और निर्भयता दोनों से परे है। जहाँ भय एक आंतरिक भावना की अभिव्यक्ति है, वहीं निर्भयता उस भावना का दमन हो सकता है, हालाँकि, अभय दोनों से परे है।सबसे पहले, मनचाहा फल न मिलने पर भय और क्रोध उत्पन्न होता है। अभय का अर्थ है कर्मफल का त्याग करके, जो भी परिणाम मिले उसे ईश्वर का आशीर्वाद मानकर स्वीकार करना (2.47), और सुख-दुःख, लाभ-हानि और जय-पराजय के बीच आंतरिक संतुलन बनाए रखना (2.38)।दूसरा, मृत्यु हमारा मूलभूत भय है जिसमें हमारी मान्यताओं, प्रतिमानों, अच्छे समय का अंत (मृत्यु) और हमारी संपत्ति की हानि (मृत्यु) भी शामिल है। अभय का अर्थ है 'अपनी मान्यताओं के विपरीत' के परिणामों को स्वीकार करना है, क्योंकि वे भी परमात्मा का ही अंश हैं। वास्तव में, कुछ संस्कृतियाँ अभय प्राप्त करने के साधन के रूप में मृत्यु के उपयोग को प्रोत्साहित करती हैं। श्रीकृष्ण ने परमात्मा की ओर यात्रा में अभय को पहली आवश्यकता के रूप मेंरखा है, क्योंकि सागर में नमक की गुड़िया के घुलने की तरह स्वयं को विलीनकरने के लिए, उनके भयंकर विश्वरूप का सामना करने के लिए, अभय आवश्यक है।

श्रीकृष्ण ने अंतःकरण शुद्धि (आंतरिक पवित्रता), ज्ञानयोग में दृढ़ता, दान, इंद्रियोंपर नियंत्रण, यज्ञ, स्वाध्याय (स्वयं का अध्ययन) और सत्यनिष्ठा को कुछ दैवी गुणों के रूप में वर्णित किया है (16.1)। भगवद्गीता में एक सामान्य सूत्र इंद्रियों पर नियंत्रण है। यद्यपि इन्द्रियाँ हमारे अस्तित्व के लिए आवश्यक हैं, फिर भी वे इच्छाएँ उत्पन्न करके हमें बाँधती हैं, जिसके परिणामस्वरूप हम मुक्ति के दिव्य मार्ग से भटक जाते हैं।आंतरिक शुद्धता को इससे पहले अध्यात्म कहा गया है और स्वभाव (आंतरिक प्रकृति) के रूपमें परिभाषित किया गया है (8.3)। यद्यपि सभी लोग जन्म के समय शुद्ध होते हैं, फिर भी बाद में समाज और परिवार द्वारा विभाजन के रूप में अशुद्धियाँ थोपी जाती हैं। परिणामस्वरूप, कुछलोगों के लिए मांसाहारी भोजन स्वीकार्य नहीं है, लेकिन अन्य के लिए यह स्वीकार्य है; चचेरे भाई से विवाह करना कुछ संस्कृतियों में स्वीकार्य है और अन्य में निषिद्ध है; एक ही परमात्माकी प्रार्थनाएँ बिल्कुल भिन्न हैं और कभी-कभी विरोधाभासी प्रतीत होती हैं; यह सूची अंतहीन है। शुद्धता प्राप्त करना इन विभाजनों को दूर करने के अलावा और कुछ नहीं है। श्रीकृष्णने इसे प्राप्त करने के एक साधन के रूप में स्वाध्याय का उल्लेख किया है। पहले उन्होंने हमें यज्ञ की तरह स्वाध्याय करने की सलाह दी थी (4.28) क्योंकि यज्ञ निःस्वार्थ कर्म है। आत्म-अध्ययन का उपयोग ज्ञान योग में दृढ़ता के एक अन्य दिव्य गुण के लिए भी किया जा सकता है जहाँ हम एक अच्छे विद्यार्थी की तरह खुद से प्रश्न करते रहते हैं।श्रीकृष्ण ने दान को एक और दिव्य गुण के रूप में कहा है। सबसे पहले, कोई भी संचय आसुरीस्वभाव का हिस्सा है और स्वयं को खाली करना दिव्य स्वभाव का एक हिस्सा है। दूसरे, यह दान देने की गुणवत्ता को विकसित करने के बारे में है न कि दान की मात्रा के बारे में। दान एक शब्द, समय, आश्वासन या कोई भौतिक चीज हो सकती है। यह जो भी हमारे पास है या जिसकी हम क्षमता रखते हैं उसे देने की आदत डालने के बारे में है। तीसरा, यह बदले में कुछ भी अपेक्षा किए बिना शुद्ध प्रेम है क्योंकि अपेक्षा दान को एक व्यवसाय बना देगी।

भगवद्गीता के पंद्रहवें अध्याय को 'पुरुषोत्तम योग' कहा जाता है। यह शीर्षक निम्नलिखित श्लोक से लिया गया है जहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं, "मैं नाशवान कार्य प्रकृति (सृष्टि) से परे हूँ और अविनाशी आत्मा (कूटस्थ) से भी उत्तम हूँ। इसलिए, वेदों और जगत में मुझे पुरुषोत्तम कहा गया है" (15.18)।एक बार जब जागरूकता स्थापित होने लगती है, तो हमारे सामने दो मूलभूत प्रश्न आते हैं: हमें क्या करना चाहिए और हमें क्या जानना चाहिए? श्रीकृष्णने पहले प्रश्न के उत्तर में हमारे सभी कर्मों को उनको अर्पण करके हमें ममत्व रहित (निर्-मम) और आशा रहित (निर्-आशा) रहने को कहा था (3.30)। श्रीकृष्ण दूसरे प्रश्न का उत्तर देते हुए कहते हैं, "जो ज्ञानी पुरुष मुझे पुरुषोत्तम के रूप में जानते हैं, वास्तव में वे सब कुछ जानते हैं। वे पूर्ण रूप से मेरीपूजा करते हैं" (15.19)। हालाँकि यह एक सरल और खुला रहस्य है, 'सब कुछ जानना' तब सम्भव होता है जब जानना अस्तित्वगत स्तर पर होता है।श्रीकृष्ण ने हमें हर समय उनका स्मरण करने का निर्देश दिया था, और अब वे हमें अपने सम्पूर्ण अस्तित्व के साथ उनकी आराधना करने के लिए कहते हैं। हर क्षण और अपनी प्रत्येक कोशिका के साथ उनकी आराधना करना असम्भव प्रतीत होता है। इस पहेली की कुंजी पहले दी गई है, 'सभी प्राणियों में स्वयं को और स्वयं में सभी प्राणियों को देखना और उन्हें सर्वत्र देखना' (6.29 और6.30)।श्रीकृष्ण इस अध्याय का समापन करते हुए कहते हैं, "मैंने तुम्हें वैदिक ग्रंथों का अति रहस्ययुक्त (गोपनीय) शास्त्र समझाया है। इसे समझकर मनुष्य ज्ञानवान और कृतार्थ हो जाता है और अपने प्रयासो में परिपूर्ण हो जाता है" (15.20)। इसका तात्पर्य यह है कि इस संसार में इस ज्ञान को प्राप्त करना ही हमारा परम कर्तव्य है।श्रीमद्भागवत पुराण में, श्रीकृष्ण ने उपरोक्त श्लोकों में जो कहा है, उनके साक्षात्कार करने का एक सरल मार्ग बताया है। वे कहते हैं कि जब हम किसी चोर, गधे या शत्रु को देखें, तो उनमे हम आत्मतत्त्व रूप श्रीकृष्ण को ही महसूस करें। निश्चित रूप से, यह समझना आसान है, लेकिन आचरण में लाना कठिन है। मूलतः, सबके पीछे वही पुरुषोत्तम हैं।

परमात्मा अनन्त सागर के समान हैं और आत्मा एक अविनाशी बूंद है जो नाशवान मानव शरीर में स्थित है। श्रीकृष्ण उस सागर का वर्णन करते हुए कहते हैं, "सूर्य में स्थित तेज जो सम्पूर्ण जगत को प्रकाशित करता है तथा जो तेज चन्द्रमा में है और अग्नि में भी है, उसको तू मेरा ही तेज जान (15.12)। मैं पृथ्वी में व्याप्त होकर सभी जीवों को अपनी शक्ति से पोषित करता हूँ। चन्द्रमा के रूप में मैं सभी वनस्पतियों को जीवन रस से पोषित करता हूँ" (15.13)।" मैं वैश्वानर (तेज शक्ति) बनकर सभी प्राणियों के शरीर में स्थित हूँ, प्राण (श्वास) और अपान (प्रश्वास) से युक्त होकर चतुर्विध अन्न को पचाता हूँ (15.14)। मैं समस्त प्राणियों के हृदय में स्थित; और मुझसे ही स्मृति (आत्म-जागरूकता), ज्ञान और अपोहन (संदेहों का समाधान) उत्पन्न होते हैं। मैं ही समस्त वेदों द्वारा जानने योग्य हूँ, मैं ही वेदान्त का रचयिता और वेदों के अर्थों को जानने वाला हूँ" (15.15)।सबसे पहले, श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे सूर्य का तेज हैं और सभी जीवों को ऊर्जा से पोषित करते हैं। पौधे इसे हमारे भोजन में बदल देते हैं। अतीत का सूर्य का प्रकाश ही वह है जिसका उपयोग हम जीवाश्म ईंधन (fossil fuel) केरूप में करते हैं। सूर्य का प्रकाश जल को तरल अवस्था में रखता है। इसलिए, यह हमें जीवित रहने और अस्तित्व में रहने में सक्षम बनाता है।दूसरे, श्रीकृष्ण ने मानव शरीर में होने वाली असंख्य प्रक्रियाओं को समझाने के लिए पाचन और श्वास प्रक्रिया को रूपकों के रूप में चुना। यह किसी शल्यचिकित्सक के चीरे के ठीक होने जैसा है; यह शरीर के विभिन्न अंगों और रसायनों के बीच सामंजस्य है जो इसे क्रियाशील बनाता है। विज्ञान 'कैसे' का उत्तर देने में तो कुशल है, लेकिन 'क्यों' का नहीं। 'प्रकाश कैसे कार्य करता है' की व्याख्या की गई है, लेकिन 'प्रकाश द्वैत क्यों है' जैसे प्रश्नों के उत्तर अनिश्चित छोड़ दिए हैं । इन श्लोकों में श्रीकृष्ण बताते हैं कि वे ही इन 'क्यों' के मूल स्रोत हैं। हालाँकि हम 'कैसे और क्यों' के निश्चित उत्तर खोजने के लिए संघर्ष करते हैं, लेकिन ये मूलतः उनकी लीला या दिव्य नाटक की अभिव्यक्तियाँ हैं।

श्रीकृष्ण विभिन्न संदर्भों में 'सृष्टि' की व्याख्या करते हैं और संकेत देते हैं कि सम्पूर्ण अस्तित्व प्रकृति और पुरुष का समन्वय है। उनका गर्भ महत्-ब्रह्म (महान प्रकृति) है जिसमें वे बीज स्थापित करते हैं जो सभी प्राणियों के जन्म का कारण है (14.3)। गुण और विकार प्रकृति से उत्पन्न होते हैं (13.20) और प्रकृति ही कारण और प्रभाव के लिए भी उत्तरदायी है; पुरुष सुख और दुःख के द्वंद्वों का अनुभव करने के लिए उत्तरदायी है (13.21)।श्रीकृष्ण आगे विस्तार से बताते हैं और कहते हैं, "सृष्टि में दो प्रकार के पुरुष हैं, क्षर (नाशवान) और अक्षर (अविनाशी)। नाशवान वे सभी प्राणी हैं जो भौतिक जगत में हैं। अविनाशी को कूटस्थ (आत्मा) कहते हैं (15.16)। लेकिन एक और शाश्वत सर्वोच्च सत्ता है जिसे परमात्मा कहते हैं। तीनों लोकों में व्याप्त होकर, वे उनका पालन करते हैं" (15.17)। मूलतः, यह शाश्वत परमात्मा ही है जो अविनाशी आत्मा और नाशवान भौतिक जगत (प्रकृति) दोनों का पालन करता है।वर्तमान वैज्ञानिक समझ यह है कि आरंभ में केवल शुद्ध ऊर्जा ही थी। समय के साथ, कुछ ऊर्जा पदार्थ में परिवर्तित हो गई। यह पदार्थ नाशवान है और कुछ भौतिक नियमों का पालन करता है, जिन्हें श्रीकृष्ण ने कारण और प्रभाव कहा है। यही पदार्थ जीवों के भौतिक शरीर बनाता है और इन जीवों को जीवित रहने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है। संक्षेप में, हम अपने आस-पास जो कुछ भी देखते हैं, वह ऊर्जा और पदार्थ का परस्पर प्रभाव है।यह वर्तमान समझ उपरोक्त श्लोकों के अनुरूप है, जहाँ श्रीकृष्ण ने कहा कि वह अपने गर्भ (जिसे यहाँ प्रकृति कहा गया है) में बीज (जिसे यहाँ अविनाशी पुरुष या आत्मा कहा गया है) स्थापित करते हैं और जीवन का आरंभ होता है।श्रीकृष्ण एक आयाम और जोड़ते हुए कहते हैं कि वे प्रकृति और पुरुष दोनों से परे हैं फिर भी उन दोनों का आधार और सहारा हैं। यह स्पष्टता हमें आत्मा और परमात्मा का बोध कराती है।

श्रीकृष्ण ने जीवन की एक रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए कहा कि उनका एक अंश देहधारी आत्मा के रूप में प्रकट होता है और इंद्रियों को आकर्षित करता है जो प्रकृति का हिस्सा हैं। यह संकेत करता है कि इच्छाएँ ही इंद्रियों को आकर्षित करती हैं। उदाहरण के लिए, देखने या सुनने की इच्छा के कारण, क्रमशःआँख या कान जैसी इंद्रियों का विकास हुआ।वे आगे देहधारी आत्मा के शरीर त्यागने और नए शरीर में प्रवेश करने की प्रक्रिया के बारे में बताते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं, "जैसे वायु सुगंध को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाती है, वैसे ही देहधारी आत्मा मन और इंद्रियों को (सूक्ष्म शरीर को) अपने साथ ले जाती है, जब वह एक पुराने शरीर को छोड़कर नए शरीर में प्रवेश करती है (15.8)। मोहग्रस्त लोग आत्मा को शरीर में निवास करते हुए, शरीर से प्रस्थान करते हुए या इंद्रियों के द्वारा विषयों का अनुभव करते हुए नहीं देख सकते। केवल ज्ञानचक्षु वाले देख सकते हैं (15.10)।मुक्ति के लिए प्रयत्नशील योगी परमात्मा को अपने भीतर विद्यमान देखते हैं; लेकिन अशुद्ध मन वाले अज्ञानीजन परमात्मा को अनुभव करने मेंअसमर्थ होते हैं, भले ही वे ऐसा करने के लिए संघर्ष करते हों" (15.11)। शुद्धताऔर कुछ नहीं बल्कि सुख-दुःख; लाभ-हानि; और जय-पराजय के बीच संतुलन है (2.38)।यह श्रीकृष्ण के द्वारा अर्जुन को पहले दिए गए आश्वासन का विस्तार है कि जब कोई व्यक्ति श्रद्धा के साथ वैराग्य और अभ्यास के माध्यम से शाश्वत अवस्था के जिस बिंदु पर देह त्याग करता है, वह अपने अगले जन्म में उसी बिंदु से शुरू करेगा जहाँ से उसने पिछले जन्म में छोड़ा था (6.37-6.45)। अनिवार्य रूप से, अनासक्ति की कुल्हाड़ी के उपयोग का अनुभव अगले जन्म तक साथ रहता है।श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि प्रयास आवश्यक हैं, लेकिन पर्याप्त नहीं हैं क्योंकि मुक्ति (शाश्वत अवस्था) प्राप्त करने के लिए हमें मन और हृदय की शुद्धता आवश्यक है। यह परमाणु हथियार बनाने के प्रयासों के समान है, लेकिनहृदय की शुद्धता का अभाव विनाश का कारण बन सकता है। यही कारण है कि कई संस्कृतियाँ और परंपराएँ ध्यान जैसी आध्यात्मिक तकनीकों को अपनाने से पहले आंतरिक शुद्धता पर जोर देती हैं।

सृष्टि को परमात्मा की लीला या दिव्य नाटक कहा जाता है और यहाँ गंभीरता से लेने जैसा कुछ भी नहीं है। इस दिव्य नाटक में कुछ नियमों का पालन किया जाता है। श्रीकृष्ण इन नियमों की व्याख्या करते हुए कहते हैं, "इस भौतिक संसार की जीवात्माएँ मेरी शाश्वत आत्मा का केवल एक अणु अंश मात्र हैं और पाँच इंद्रियों और मन को आकर्षित करती हैं, जो प्रकृति का एक हिस्सा हैं (15.7)। श्रवण, दृष्टि, स्पर्श, स्वाद, गंध की ग्राहिका इंद्रियों तथा मन को अधिष्ठान बनाकर यह जीवात्मा इंद्रिय विषयों का भोग करता है" (15.9)। श्रीकृष्ण ने पहले प्रकृति और पुरुष को अनादि कहा था। गुण और विकार प्रकृति से पैदा होते हैं (13.20)। प्रकृति कारण और प्रभाव के लिए जिम्मेदार है; पुरुष सुख और दुःख के द्वंद्वों का अनुभव करने के लिए जिम्मेदार है (13.21)। साथ मिलकर ये श्लोक जीवन की रूपरेखा प्रस्तुत करते हैं।सबसे पहले, परमात्मा का एक अंश प्रत्येक प्राणी के भीतर विद्यमान है जिसे हम आत्मा कहते हैं और इस अर्थ में, हम उससे कभी अलग नहीं होते। बस, इंद्रिय जगत का अनुभव करते हुए हम भूल जाते हैं कि हम वास्तव में कौन हैं। दूसरा, इस बात का कोई उत्तर नहीं है कि आत्मा इंद्रियों को क्यों आकर्षित करती है और सुख-दुःख के चक्कर में क्यों पड़ जाती है। इसलिए यह बस एक लीला है और यही जीवन है।हमारी सामान्य समझ यह है कि इन्द्रियाँ बहुत शक्तिशाली होती हैं और हमें उन पर नियंत्रण करना सीखना चाहिए। हालाँकि, श्रीकृष्ण एक नया दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं, जब वे कहते हैं कि ये इन्द्रियाँ सबसे पहले आत्मा द्वारा प्रकाशित होती हैं। एक बार जब वे अपनी इंद्रियों के विषयों से मिलती हैं, तो वे सुख और दुःख के द्वंद्वों का निर्माण करने के लिए बाध्य हो जाती हैं (2.14)। लक्ष्य इस आसक्ति को समाप्त करना और इंद्रियों का स्वामी बननाहै ताकि उनका उपयोग किसी अन्य उपकरण की तरह किया जा सके।

श्रीकृष्ण कहते हैं, "वे जो अभिमान और मोह से मुक्त हो गए हैं, जिन्होंने आसक्ति की बुराइयों पर विजय पा ली है, जो निरंतर अपनी आत्मा और भगवान में लीन रहते हैं, जिनकी कामनाएँ पूर्ण रूप से नष्ट हो गई हैं और सुख-दुःख के द्वन्द्वों से परे हैं, ऐसे मान और मोह रहित ज्ञानीजन मेरे शाश्वत धाम को प्राप्त करते हैं" (15.5)।मूलतः, ये उनके धाम में पहुँचने के गुण हैं और यदि एक बार हम इनकोप्राप्त कर लेते हैं, तो हम उनके धाम में होते हैं। एक और संकेत यह है कि उनका धाम कहीं बाहर नहीं है, बल्कि अंदर ही है, जिसे खोजा जाना बाकी है।श्रीकृष्ण ने उन गुणों का वर्णन किया है जो हमें उनके धाम की यात्रा में मार्गदर्शक मील के पत्थरों के रूप में सहायता कर सकते हैं। मैत्रीपूर्ण और दयालु होना; ममत्व रहित और निर्-अहंकार; किसी भी प्राणी से द्वेष न रखना; सुख-दुःख में समभाव रखना (सम-सुख-दुःख) और क्षमाशील होना (क्षमाशील); सदैव संतुष्ट और व्याकुलता से मुक्त रहना; ईर्ष्या, भय और चिंता से मुक्त रहना; सभी कार्यों में अपेक्षाओं और स्वार्थ से मुक्त रहना (12.13 से 12.16); विनम्र और क्षमाशील होना; इंद्रिय विषयों के प्रति वैराग्य; वांछनीय और अवांछनीय परिस्थितियों के प्रति अनासक्ति और शाश्वत समभाव (13.8-13.12) इनमें सम्मिलित हैं ।श्रीकृष्ण आगे कहते हैं, "न तो सूर्य, न ही चंद्रमा, और न ही अग्नि मेरे उस परम धाम को प्रकाशित कर सकते हैं, जहाँ जाने के बाद, कोई कभी वापस नहीं आता" (15.6)।किसी न किसी रूप में, हम सभी उनके धाम के मार्ग पर हैं क्योंकि हम सभी उस आनंद, तृप्ति और मुक्ति की खोज में हैं। हमारी सामान्य मान्यता यह है कि उनके आशीर्वाद से हम अपनी इच्छाओं की पूर्ति कर सकते हैं और संपत्ति, सफलता, नाम और प्रसिद्धि के माध्यम से आनंद को अधिकतम कर सकते हैं। हालाँकि, प्रत्येक सुख के बाद दुःख अवश्य आता है, जिसके परिणामस्वरूप दोनों के बीच निरंतर झूलना पड़ता है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि द्वंद्वों से मुक्ति उनके धाम की पहचान है। उनके धाम तक पहुँचना कुछ और नहीं बल्किइच्छाओं का त्याग और सुख-दुःख आदि द्वंद्वों से ऊपर उठना है, जो आनंदमय जीवन है।

श्रीकृष्ण ने जीवन के उल्टे वृक्ष की बात की, जहाँ मनुष्य नीचे की ओर लटकती कर्म रूपी जड़ों से बंधा हुआ है। श्रीकृष्ण हमें तुरंत इस बन्धन से मुक्त होने के लिए 'अनासक्ति की कुल्हाड़ी' का प्रयोग करने की सलाह देते हैं (15.3)।अनासक्ति भगवद्गीता के मूलभूत सिद्धांतों में से एक है। श्रीकृष्ण ने कईअवसरों पर इस शिक्षा का उल्लेख किया है। मोटे तौर पर, हम लोगों, वस्तुओं, भावनाओं, विचारों और विश्वासों से आसक्त होते हैं। हमारी कई मान्यताएँ अवैज्ञानिक मिथकों, तर्कहीन मान्यताओं या अपुष्ट सूचनाओं पर आधारित होती हैं। एक अच्छा शिक्षार्थी बनने के लिए श्रीकृष्ण के द्वारा बताए गए 'प्रश्न पूछने' के गुण को विकसित करके, व्यक्ति उनसे अनासक्ति प्राप्त कर सकता है (4.34)। जबकि हमें अनासक्ति के बारे में बताया जाता है, हम विरक्ति यायहाँ तक कि घृणा की ओर आकर्षित होता है। इसीलिए श्रीकृष्ण ने हमेंस्पष्ट रूप से घृणा त्यागने के लिए कहा है।हमें आसक्ति से छुटकारा पाना बहुत मुश्किल लगता है क्योंकि यह लंबे समय से हमारे द्वारा पोषित की गई है और यह हमारा एक हिस्सा बन जाती है। इसका मूल संदेश यह है कि आसक्ति को त्यागना है, लेकिन वस्तुओं और संबंधों को तोड़ना नहीं है। वास्तव में, इसका अर्थ है किसी भी परिस्थिति में आसक्ति के बिना अपना सर्वश्रेष्ठ करना।श्रीकृष्ण कहते हैं, "इस अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष का वास्तविक स्वरूप, इसका आदि, इसका अंत और इसकी निरंतरता के रूप - इनमें से कुछ भी सामान्य मनुष्य नहीं समझ सकता। अनासक्ति की प्रबल कुल्हाड़ी से इसे काटकर इस वृक्ष के मूल को खोजना चाहिए, जो कि परमेश्वर हैं, जिनसे बहुत समय पहले ब्रह्माण्ड की गतिविधियाँ प्रवाहित हुई थीं। उनकी शरण में आने पर, मनुष्य इससंसार में पुनः नहीं लौटेगा" (15.3 और 15.4)।एक बार जब कोई अनासक्ति की कुल्हाड़ी से लैस हो जाता है, तो वृक्ष के मूल अर्थात् परमात्मा की खोज शुरू हो जाती है।

भगवद्गीता के पंद्रहवें अध्याय को 'पुरुषोत्तम योग' कहा जाता है। श्रीकृष्ण इस अध्याय का प्रारम्भ उल्टे जीवन वृक्ष का वर्णन करते हुए कहते हैं, "ज्ञानी लोग एक शाश्वत अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष की चर्चा करते हैं, जिसकी जड़ें ऊपर की ओर और शाखाएँ नीचे की ओर होती हैं, और जिसके पत्ते वेदों के मंत्र हैं। जो इस वृक्ष को जानता है, वही वास्तव में वेदों का ज्ञाता है (15.1)। तीनों गुणों से पोषित, इस वृक्ष की शाखाएँ ऊपर और नीचे की ओर फैली हुई हैं; इसकी कोमल कोपलें इंद्रिय विषय हैं; इसकी जड़ें नीचे की ओर फैली हुई हैं, जो मनुष्यों को कर्म से बाँधती हैं" (15.2)।सबसे पहले, जो लोग इस वृक्ष को जानते हैं, उन्हें वेदों का ज्ञान प्राप्त होता है। वेदों का शाब्दिक अर्थ है ज्ञान। एक संभावित व्याख्या यह है कि वेदों द्वारा प्रस्तुत ज्ञान को प्राप्त करने के लिए उन्हें पढ़ने का कष्ट उठाने की आवश्यकता नहीं है। एक बार जब इस जीवन-वृक्ष को अस्तित्वगत स्तर पर समझ लिया जाता है, तो वही ज्ञान प्राप्त हो जाता है।दूसरे, अश्वत्थ का अर्थ है ‘वह जो कल भी एक सा नहीं रहता।' लेकिन वृक्षको शाश्वत बताया गया है। यह कुछ विरोधाभासी प्रतीत होता है, जैसे प्रकाश का तरंग–कण द्वैत (wave–particle duality) का विरोधाभास। मूलतः, वृक्ष शाश्वत और परिवर्तन दोनों का मिश्रण है। आगे के श्लोकों में और स्पष्टता आएगी।अंततः, यह रूपक हमें अपने आस-पास की दुनिया के बारे में अपनीसोच को बदलने में मदद करेगा। हमारे विचार में प्रगति का अर्थ है शक्ति और प्रसिद्धि के मामले में कुछ उच्चतर प्राप्त करना; अधिक संपत्ति प्राप्त करना।हम आध्यात्मिक प्रगति के बारे में भी ऐसा ही सोचते हैं। यह रूपक इंगित करता है कि उच्च आध्यात्मिक प्रगति का अर्थ है जड़ों की ओर लौटना। यह त्यागने के बारे में है न कि प्राप्त करने के बारे में; यह हमारे जीवन के दौरान बने तंत्रिका प्रतिरूपों को तोड़ने जैसा है; यह एक नमक की गुड़िया की तरह है जो समुद्र के साथ एक होने के लिए खुद को विलीन कर रही है। मूलतः, हमें उस धूल को हटाना है जो हमने लंबे समय से जमा की है।

भगवद्गीता के चौदहवें अध्याय को ‘गुण त्रय विभाग योग' कहा जाता है, जिसमे गुणों और गुणातीत की व्याख्या की गई है। श्रीकृष्ण इस अध्याय का समापन गुणों से परे जाने का उपाय बताते हुए करते हैं और कहते हैं, "जो लोग अनन्य (अव्यभिचारेण) भक्ति के साथ मेरी सेवा करते हैं, वे तीनों गुणों से ऊपर उठकर ब्रह्म (गुणातीत) के स्तर पर पहुँच जाते हैं (14.26), क्योंकि मैं ही उस निराकार ब्रह्म का आधार हूँ जो अमर, अविनाशी, शाश्वत धर्म और असीम दिव्य आनंदस्वरूप है” (14.27)। श्रीकृष्ण 'व्यभिचारेण' शब्द का प्रयोग करते हैं, जिसका अर्थ है अनेक इच्छाएँ। 'अव्यभिचारेण भक्ति' एकनिष्ठ भक्ति है। इसी संदर्भ में, श्रीकृष्ण ने इसे इंगित करने के लिए 'अवेश्य' का प्रयोग किया (12.2)। मूलतः, यह अनेक मनों से परे होकर ईश्वर के प्रति एकनिष्ठ भक्ति है जो हमें गुणातीत बना देगा।सबसे पहले, गुणातीत यह समझकर कर्तापन का भाव त्याग देता है कि किसी भी कर्म का कोई कर्ता नहीं है और सभी कर्म विभिन्न गुणों के परस्पर प्रक्रिया का परिणाम हैं।दूसरे, उसे यह बोध हो जाता है कि दूसरे भी अपने द्वारा किए गए किसी भी कर्म के लिए उत्तरदायी नहीं हैं। परिणामस्वरूप, वह सम्मान या अपमान से प्रभावित नहीं होता, क्योंकि दोनों ही गुणों की परस्पर क्रिया है, जिसका परिणाम शत्रुता का त्याग है।अंततः, उसे यह बोध होता है कि सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण सुखद और अप्रिय परिस्थितियाँ उत्पन्न करने में सक्षम हैं। अतः, वह अब ऐसीपरिस्थितियों से प्रभावित नहीं होता। इसी प्रकार, वह प्रशंसा और आलोचना से भी प्रभावित नहीं होता, क्योंकि वह समझता है कि ये गुणों के कारणहोते हैं। गुणातीत की यह अवस्था आनंद की अवस्था है और यही हम सभी के जीवन का लक्ष्य होना चाहिए।

श्रीकृष्ण गुणातीत के आचरण के बारे में बताते हैं जो प्रकृति के तीन गुणों से ऊपर उठ गए हैं और कहते हैं, “वे जो सुख और दुःख में समान रहते हैं;जो आत्मा में स्थित हैं; जो मिट्टी के ढेले, पत्थर और सोने के टुकड़े को समान मानते हैं; जो सुखद और अप्रिय घटनाओं में एक समान रहते हैं; जो बुद्धिमान हैं, जो निन्दा और प्रशंसा दोनों को समभाव से स्वीकार करते हैं; जो सम्मान और अपमान में एक समान रहते हैं; जो मित्र और शत्रु दोनों के साथ समान व्यवहार करते हैं; और जिन्होंने कर्तापन के सभी मोहों को त्याग दिया है - वे तीनोंगुणों से ऊपर उठ गए हैं" (14.24 और 14.25)। संकेत यह है कि गुणातीत समदर्शी होने के साथ-साथ द्वन्द्वातीत भी है। जब इन्द्रियाँ इंद्रिय विषयों से मिलती हैं तो हमारे अंदर सुख और दुःख के द्वंद्व उत्पन्न होते हैं। श्रीकृष्ण ने पहले सलाह दी थी कि इन्हें अनदेखा करना सीखें क्योंकि ये क्षणिक हैं (2.14)। जीवन के अनुभव हमें बताते हैं कि द्वंद्व न केवल क्षणिक होते हैं बल्कि समय के साथ अपना स्वभाव भी बदलते हैं। विवाह का सुख तलाक के दुःख में बदल सकता है; एक मित्र शत्रु में बदल सकता है। जब हम अच्छे और बुरे; सुखद और अप्रिय द्वंद्वों का सामना करते हैं, उस समय समभाव बनाए रखना है। जबकि घटनाएं प्रकृति में घटित होती हैं, हम उन्हें सुखद या दुःखद परिस्थितियों के रूप में व्याख्यायित करते हैं। हम दूसरों के शब्दों को प्रशंसा या आलोचना के रूप में ग्रहण करते हैं, और परिवार तथा कार्यस्थल में अपनी इच्छाएँ पूरी करने के लिए प्रशंसा और आलोचना - दोनों को साधन के रूप में उपयोग करते हैं। मूलतः, यह अपनी व्याख्याओं और मान्यताओं को त्यागने के बारे में है।भगवद्गीता प्राथमिक कक्षा से लेकर स्नातकोत्तर तक की पाठ्यपुस्तक है। ये श्लोक शुरुआती बच्चों के लिए भी समझने में बहुत आसान हैं। परंतु मूल बात यह है कि हम प्रत्येक परिस्थिति का विश्लेषण करके, और उन पूर्व अनुभवों पर मनन करके - जब हम प्रशंसा या आलोचना, सम्मान या अपमान से प्रभावित हुए थे - इन अंतर्दृष्टियों को अस्तित्वगत स्तर पर आत्मसात करें। हमें यह भी स्मरण रखना चाहिए कि प्रत्येक परिस्थिति को श्रीकृष्ण की लीला के रूप में देखना चाहिए।

यह समझाने के बाद कि सत्व, रजस् और तमस् नामक तीन गुण आत्मा को भौतिक शरीर से बांधते हैं, श्रीकृष्ण इन गुणों को पार करके गुणातीत या निर्गुण बनने के लिए कहते हैं। अर्जुन ने तुरंत पूछा कि इन तीनों गुणों से अतीत पुरुष के लक्षण क्या हैं, उसका आचरण कैसा होता है और वह इन तीनोंगुणों से कैसे परे जाता है (14.21)।श्रीकृष्ण कहते हैं, "तीनों गुणों से अतीत मनुष्य सत्वगुण से उत्पन्न प्रकाश, रजोगुण से उत्पन्न कर्म, और तमोगुण से उत्पन्न मोह के उपस्थित होने पर उनसे घृणा नहीं करते और अनुपस्थित होने पर उनकी लालसा नहीं करते (14.22)। वे उदासीन रहते हैं, गुणों से विचलित नहीं होते; वे यह जानकर कि सृष्टि में केवल गुण ही कार्यरत हैं, आत्मा में दृढ़ और केंद्रित रहते हैं” (14.23)। यह न तो गुणों की किसी भी अभिव्यक्ति के साथ लगाव (राग या आसक्ति) है और न ही वैराग्य (विराग या विरक्ति) है। श्रीकृष्ण ने ऐसी शाश्वत स्थिति का वर्णन करने के लिए वीतराग या अनासक्ति का उपयोग किया था। दूसरे, ऐसीपरिस्थिति में, श्रीकृष्ण ने इससे पहले हमें घृणा का त्याग करने की सलाह दी थी, लेकिन कर्म का नहीं। तीसरा, यह गुणों को अपना दास बनाने के बारे में है। जब हमें सोने की आवश्यकता हो, तो तमोगुण का आह्वान करें; जब हमें कोई कार्य करना हो, तो रजोगुण का उपयोग करें; सीखने के लिए सत्वगुण का प्रयोग करें। यह दासता की अवस्था से गुणों के प्रभुत्व की ओर बढ़ना है।उस अवस्था में, व्यक्ति को यह बोध होता है कि इन तीनों गुणों के अलावा कोई कर्ता नहीं है। इन तीनों के बीच की परस्पर क्रिया ही कर्म का कारण बनती है,लेकिन यह हमारे या किसी और के कारण नहीं होता।एक मार्ग है कर्म को कर्मफल से अलग करना, यह समझकर कि कर्मफल कई कारकों पर निर्भर करता है। दूसरा है कर्ता को कर्म से अलग करना,यह समझकर कि तीनों गुण ही वास्तविक कर्ता हैं। दोनों ही मार्ग निर्-अहंकार (मैं कर्ता हूँ की भावना से मुक्ति) की ओर ले जाते हैं। इस प्रकार व्यक्ति स्वयं में केंद्रित होता है और श्रीकृष्ण ने इसे आत्मरमण या नित्यतृप्त (सदैवसंतुष्ट) कहा है।

పరమాత్ముని రూపంలో ఉన్న శ్రీకృష్ణుడు, "సకల ప్రాణులయందును ఆత్మరూపముననున్న నన్ను (వాసుదేవుని) చూచుపురుషునకు, అట్లే ప్రాణులన్నింటిని నాయందు అంతర్గతములుగా ఉన్నట్లు చూచువానికి నేనుఅదృశ్యుడుని కాను, అతడును నాకు అదృశ్యుడు కాడు" అనిచెప్పారు (6.30). ఈ శ్లోకం భక్తి యోగానికి పునాది, ఇక్కడఅభ్యాసకులు ప్రతిచోటా మరియు ప్రతి పరిస్థితిలోనూ పరమాత్మను దర్శించగలుగుతారు.'అంతా అయనే' అనే మంత్రంలో, 'అంతా' అనేదిఒక వ్యక్తి లేదా వస్తువు లేదా పరిస్థితి కావచ్చు. ఈ మంత్రాన్ని పునరావృతం చేస్తూ, ఈ విషయము గురించి లోతైన అవగాహన కలిగితే అది అద్భుతాలు సృష్టిస్తుంది. ఈ విషయాన్ని గుర్తించిన తర్వాత మిత్రుడులోనైనా, శత్రువులోనైనా, సహాయం చేసినవారిలోను, కష్టాన్ని కలిగించినవారిలోను, పొగడ్తలోనూ, విమర్శలోనూ, బంగారంలోనూ, రాయిలోనూ లేదా అనుకూల ప్రతికూల పరిస్థితుల్లోనూ, సంతోషంలోనూ, ఆందోళనలోనూ,సంతృప్తిలోనూ, దు:ఖంలోనూ, జయాపజయాల్లోనూ పరమాత్మను చూడగలుగుతాము. ఒక్క మాటలో చెప్పాలంటే అన్నిపరస్పర విరుద్ధ అంశాలలో మనము పరమాత్మను దర్శించుకోగలుగుతాము.భక్తులు నన్ను సేవించిన రీతికి అనుగుణంగా నేను వారిని అనుగ్రహిస్తాను (4.11), నాకు అప్రియుడుకాని, ప్రియుడుకాని ఎవరూ లేరు (9.29) అని శ్రీకృష్ణుడు అంతకుముందు చెప్పారు.కానీ, "ప్రాణులన్నింటిని నాయుందు అంతర్గతములుగా ఉన్నట్లు చూచువానికి నేను అదృశ్యుడని కాను, అతడును నాకు అదృశ్యుడు కాడు" (6.30) అనేది మనలోని విభజన యొక్క కొలమానాన్ని, పరమాత్మ నుండి మన దూరాన్ని సూచిస్తుంది అంతేకాని పరమాత్మ ఎవరినీ ద్వేషిస్తూన్నాడని కాదు.‘‘పరమాత్మను చేరుకున్నవాడు, సకల చరాచర జీవరాశిలలోనూనన్నే చూడగలిగినవాడు ఎటువంటి జీవనాన్ని కొనసాగించినా అతడి భక్తి శ్రద్దల్లో నేను కొలువుదీరి ఉంటాను'' అని శ్రీకృష్ణుడు భరోసా ఇస్తున్నారు (6.31). దీని అర్ధం ఏమిటంటే మనం ఏమి చేస్తున్నాము, మన దగ్గర ఏమి ఉన్నది అన్నది ముఖ్యం కాదు. సకల చరాచర జీవరాశిలలో ఆ పరమాత్మను చూడటమే ముఖ్యం. భౌతిక ప్రపంచం సుఖదు:ఖాలనే పరస్పర విరుద్ధ అంశాలతో కూడుకుని ఉంటుంది. మన జీవన విధానం సంపన్న జీవితముఅయిననూ, కష్టాల జీవితము అయిననూ మనలను సుఖదు:ఖాలనే భావనలు ఆవహిస్తూ ఉంటాయి. కోపం, ఉద్వేగం,ఉద్రిక్తతలకు లోనవుతూనే ఉంటాము. అందుకే శ్రీకృష్ణుడు మనల్ని ఏకత్వములో స్థిరపడమని తద్వారా ఈ పరస్పర విరుద్ధ భానవల నుండి విముక్తులవమని బోధిస్తున్నారు.

श्रीकृष्ण कहते हैं, "जब बुद्धिमान व्यक्ति (द्रष्टा) यह देखते हैं कि सभी कार्यों में प्रकृति के तीनों गुणों के अलावा कोई कर्ता नहीं है और जो तीनों गुणों से अत्यन्त परे मुझ परमात्मा को तत्त्व से जानते हैं, वे मेरी दिव्य प्रकृति को प्राप्त करते हैं (14.19)। शरीर से संबद्ध तीन गुणों को पार करके गुणातीत होकर शरीरधारी जीव (देही) जन्म, मृत्यु, रोग, बुढ़ापे और दुःखों से मुक्त होकर अमरत्व (मोक्ष) को प्राप्त करता है” (14.20)। मूलतः, तीनों गुण ही कर्म के कर्ता या वास्तविक कर्ता हैं।मृत्यु को समझने का एक तरीका यह है कि जब शरीर किसी कारण से स्वचालितता बनाए रखने में असमर्थ हो जाता है, तो आत्मा का भौतिक शरीर से वियोग हो जाता है। इसके बाद, अमर आत्मा दूसरे शरीर में चली जाती है और यह चक्र चलता रहता है। इससे यह विश्वास उत्पन्न होता है कि हमारे जीवन के अकथनीय बुरे दौर पिछले जन्मों के बुरे कर्मों, पापों याअभिशापों का परिणाम हैं, और अच्छे दौर पिछले जन्मों के पुण्य कर्म हैं। आध्यात्मिक ग्रंथों में भी इसी प्रकार व्याख्या की गई है।दूसरे प्रकार की मृत्यु आत्मा का भौतिक शरीर से अलग होना है, जबकि शरीर अभी भी सक्षम और क्रियाशील है। इसे मोक्ष (जीवन मुक्ति) या आत्मज्ञान कहते हैं। यह वह अवस्था है जहाँ गुणों में आत्मा को भौतिक शरीर से बाँधनेकी क्षमता नहीं रह जाती। श्रीकृष्ण इस अवस्था को गुणों से परे होना कहते हैं और कहते हैं कि ऐसे लोग ईश्वर को प्राप्त कर लेते हैं। वे दुःखों से मुक्त हो जाते हैं और अमर हो जाते हैं।ये श्लोक स्पष्ट करते हैं कि कोई भी गुण न तो निम्न है और न ही उच्च। ये प्रकृति के गुण हैं जिनकी अलग-अलग विशेषताएँ हैं, लेकिन ये सभी आत्मा को शरीर से बांधते हैं। सार सभी गुणों से परे जाने का है। गुणातीत होना स्वस्थ होने के समान है, जबकि किसी भी गुण के प्रभाव में होना रोग से ग्रस्त होने के समान है। एक और निष्कर्ष यह है कि व्यक्ति किसी भी गुण से ऊपर उठकर गुणातीत की स्थिति में पहुँच सकता है। गुणों में कोई पदानुक्रम नहीं है, इसलिए हमें किसी क्रम का पालन करने की आवश्यकता नहीं है।

భారతీయులు తారసపడినప్పుడు ఒకరికొకరు నమస్తే, సమస్కారం అని అభినందించుకుంటారు. 'నీలోని దైవత్వానికి వందనం' అన్నది ఈ పదానికి అసలైన అర్థం. విభిన్న సంస్కృతులలోని శుభాకాంక్షలు ఇదే విధమైన సందేశాన్ని అందిస్తాయి. "అన్నిజీవులలో తన ఆత్మను మరియు అన్ని జీవులని తన ఆత్మలో చూడటం మరియు ప్రతిచోటా అదే చూడటం" (6.29) అన్న శ్రీకృష్ణుడు ప్రభోధాన్ని ఆచరణలో పెట్టటడమే ఈ పదము యొక్క ప్రయోగం. ఈ అవగాహనతో మనము ఈ విధంగా పరస్పరం అభినందించుకున్నప్పుడు మనలోనూ, ఇతరుల్లోనూ ఉన్న దైవత్వాన్ని గ్రహించే దిశగా అడుగులు వేస్తున్నట్లే.‘ప్రతిచోటా అదే చూడటం' అనేది నిరాకార మార్గం. ఇది కఠినమైన మార్గంగా పరిగణించబడినది. శ్రీకృష్ణుడు వెంటనే దానిని సులభతరం చేస్తూ ‘సర్వత్రా నన్నే చూడు, నాలోనే సర్వస్వాన్నీ చూడు' (6.30) అని చెప్తున్నారు. ఇది 'రూపం' లేదాసాకార మార్గం. ఈ శ్లోకాలు 'సాకార' మరియు 'నిరాకార' మార్గాల ద్వారా పరమాత్మ ప్రాప్తిని పొందచేసే మార్గాలు. ప్రతి సంస్కృతీ పరమాత్మను చేరుకోవటానికి ఈ రెండింటిలో ఏదో ఒక మార్గాన్ని ప్రబోధిస్తుంది.అవ్యక్తం అనంతము, అపరిమితము కానీ భౌతికంగా వ్యక్తీకరించబడిన దానికి పరిధులు, పరిమితులు, విభజనలు, వర్గీకరణలూ ఉంటాయి. ఆత్మలోనే అన్నిటినీ చూడటం, అన్నిటిలోనూ ఆత్మను చూడటం అన్నది అవ్యక్తమైన ఆత్మతోఅనుబంధాన్ని పెంపొందించుకోవటమే. దీనిని సమృద్ధి లేదా సంతృప్త మనస్తత్వం అంటే విజయ-విజయ మనస్తత్వం అని కూడా అంటారు. అసంతృప్త మనస్తత్వం అనేది అందరికి నష్టాన్నితీసుకువచ్ఛేది. గమనించదగ్గ విషయం ఏమిటంటే, అవ్యక్తమైన ఆత్మగురించి తెలుసుకున్న తర్వాత కూడా, వ్యక్త ప్రపంచములోనిప్రాథమిక మూలాంశములు మారవు. మనకు ఆకలి వేస్తుంది అందువల్ల మనుగడ సాగించుటకు మనము మన కర్మలు చేస్తూనే ఉండాలి (3.8). వీటిని ఇంతకుముందు శ్రీకృష్ణుడిచే కర్తవ్యకర్మలు(6.1) లేదా శాస్త్రవిహిత కర్మలని సూచించబడ్డాయి. ఇది వర్తమాన క్షణంలో మన కర్మలను మన సమర్ధత మేరకు చేయడం తప్ప మరొకటి కాదు. ఇది నాటకంలో పాత్ర పోషించడం లాంటిది.ఇందులో ఇతర కళాకారులు తమ పాత్రల ప్రకారం మన పాత్రను చేసే ప్రశంసలు మరియు విమర్శలు మనల్ని ప్రభావితం చేయని రీతిగా ఉంటుంది.

श्रीकृष्ण कहते हैं, "जब देहधारी जीव सत्त्वगुण की प्रधानता में मृत्यु को प्राप्त होता है, तब वह उत्तम ज्ञान वालों के शुद्ध लोकों को प्राप्त होता है(14.14)। जो व्यक्ति रजोगुण की प्रधानता में शरीर त्याग करता है, वह कर्मों में आसक्त लोगों के बीच जन्म लेता है। और जो तमोगुण में लीन होकर मृत्यु को प्राप्त होता है, वह मूढ़ (अविवेकी या अज्ञानमय) योनियों में जन्म लेता है"(14.15)। श्रीकृष्ण ने पहले जीवन-मृत्यु-जीवन के बारे में समझाया था जहाँउन्होंने कहा था कि जब कोई मृत्यु के समय उनका स्मरण करता है तो वह उन तक पहुँच जाता है, लेकिन उन्होंने आगाह किया कि व्यक्ति अपने जीवनकाल में जो अभ्यास करता है, वही निर्धारित करता है कि उसकी मृत्यु के पश्चात क्या होगा (8.5 और 8.6)। यह इंगित करता है कि जीवन से मृत्यु और फिर जीवन में संक्रमण स्वाभाविक है, इसमें कोई विस्मय नहीं है। यदि किसी का जीवन सत्वगुण प्रधान है, तो संक्रमण सत्व के माध्यम से ही होगा। यही बात रजोगुण और तमोगुण के साथ भी लागू होती है। श्रीकृष्ण इन तीन गुणों के द्वारा उत्पन्न विभिन्न कर्मफलों का वर्णन करते हुए कहते हैं, "सत्वगुण का फल सद्भाव और पवित्रता है। रजोगुण का फल दुःख है। तामसिक कर्मों का फल अज्ञान है (14.16)। सत्वगुण से ज्ञान उत्पन्न होता है, रजोगुण से लोभ और तमोगुण से भ्रम और अज्ञान पैदा होते हैं (14.17)। सत्वगुण में स्थित जीव ऊपर स्वर्गादि उच्च लोकों मे जाते हैं; रजोगुण में स्थापित पुरुष मध्य में पृथ्वीलोक पर ही रहते हैं और तमोगुण में स्थित पुरुष अधोगति की ओर जाते हैं" (14.18)। पुस्तक पढ़ने का उदाहरण हमें गुणों के संदर्भ में कर्मफल को समझने में मदद करेगा। जब हम सत्वगुण से प्रभावित होते हैं, तो हम ज्ञान और समझ प्राप्त करने के लिए कोई पुस्तक पढ़ते हैं। रजोगुण में रहते हुए हम अच्छे अंक पाने के लिए पढ़ते हैं जो तनाव पैदा करता है। तमोगुण में हम पुस्तक पढ़ते-पढ़ते सो जायेंगे।ध्यान देने योग्य बात यह है कि प्रत्येक गुण अपने तरीके से आत्मा को भौतिक शरीर से बांधता है। उपरोक्त श्लोक हमारे जीवनकाल के दौरान हमारे अंदर प्रबल गुण के आधार पर जीवन के विभिन्न पहलुओं की झलक देते हैं।

श्रीकृष्ण कहते हैं, "सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण नामक प्रकृति से उत्पन्न तीन गुण अविनाशी जीवात्मा को शरीर में बांधते हैं (14.5)। इनमें, सत्वगुण निर्मल होने के कारण आत्मा को सुख और ज्ञान के भावों के प्रति आसक्ति उत्पन्न करके उसे बन्धन में डालता है (14.6)। रजोगुण की प्रकृति इच्छा है। यह कामना और आसक्ति को जन्म देता है और आत्मा को कर्म में बांधता है (14.7)। तमोगुण अज्ञान से उत्पन्न होता है और देहधारी जीवात्माओं में मोह का कारण है। तमोगुण सभी जीवों को असावधानी, आलस्य और निद्रा के द्वारा भ्रमित करता है" (14.8)।मूलतः, प्रकृति से उत्पन्न तीन गुण आत्मा को, जो कि परमात्मा का बीज है, भौतिक शरीर से बांधने के लिए उत्तरदायी हैं।श्रीकृष्ण आगे कहते हैं, "सत्वगुण सुख में बांधता है, रजोगुण कर्म में, जबकितमोगुण ज्ञान को ढककर आत्मा को प्रमाद में रखता है 14.9)। कभी-कभी सत्वगुण प्रबल होकर रजोगुण और तमोगुण पर हावी हो जाता है; कभी-कभी रजोगुण, सत्वगुण और तमोगुण पर हावी होता है; और कभी-कभी तमोगुण, सत्वगुण और रजोगुण पर हावी हो जाता है" (14.10)। इसका तात्पर्य यह है कि हम अलग-अलग समय पर इन गुणों के विभिन्न अनुपातों के संयोजन के प्रभाव में रहते हैं। जिस प्रकार तीन प्राथमिक रंग, लाल, पीला और नीला, मिलकर अनन्त रंग उत्पन्न करते हैं, उसी तरह ये तीन गुण हमारे आस-पास दिखाई देने वाले विविध व्यवहारों के लिए उत्तरदायी हैं।अगला प्रश्न है, यह कैसे पता चले कि किसी निश्चित समय पर कौन सा गुण हमें बाँध रहा है। श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं, "जब सत्व गुण प्रबल होता है तो शरीर के सभी द्वार ज्ञान के प्रकाश से आलोकित हो जाते हैं (14.11)। जब रजोगुण प्रबल होता है तब लोभ, सकाम कर्म का प्रारम्भ, बेचैनी, अनियंत्रित इच्छा एवं लालसा के लक्षण प्रकट होते हैं (14.12)। तमोगुण जब हावी होता है तो अंधकार, जड़ता, असावधानी और भ्रम पैदा करता है" (14.13)। तमोगुण केहावी होने पर हम सो जाते हैं। रजोगुण हमें कर्म करने और सिद्धि के लिए प्रेरित करता है। सत्वगुण सीखने और ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रेरणादायी है। इसलिए, गुण ही हमसे उत्पन्न होने वाले प्रत्येक कार्य के वास्तविककर्ता हैं। जागरूकता मूलतः उस गुण को पहचानने की क्षमता है, सके नियंत्रण में हम किसी भी क्षण होते हैं।

भगवद्गीता के चौदहवें अध्याय का शीर्षक 'गुण त्रय विभाग योग' अर्थात्गुणों से परे जाकर एकता है। यह पहले बताए गए प्रकृति के वर्णनका विस्तार है। इस अध्याय में, श्रीकृष्ण प्रकृति से उत्पन्न गुणों के बारे में और ज्ञान प्राप्त करके उनको कैसे पार किया जाए इस विषय में गहराई से बताते हैं।श्रीकृष्ण कहते हैं, "अब मैं पुनः तुम्हें सभी ज्ञानों में उत्तम उस परम ज्ञान के विषय में बताऊँगा, जिसे जानकर सभी महान संतों ने परम सिद्धि प्राप्त की है(14.1)। वे जो इस ज्ञान की शरण लेते हैं, मेरे साथ एकीकृत होंगे और वे सृष्टि के समय न तो पुनः जन्म लेंगे और न ही प्रलय के समय उनका विनाश होगा" (14.2)।सबसे पहले, श्रीकृष्ण कहते हैं कि मैं फिर से समझाऊंगा, जो पहले बताई गई बातों को दोहराने की ओर संकेत करता है। कहा जाता है कि बार-बार दोहराना ही महारथ की कुंजी है। उदाहरण के लिए, किसी पुस्तक की विषय-वस्तु एक ही होती है, फिर भी बार-बार पढ़ने से हमारी समझ बढ़ती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हर बार पढ़ने के साथ हमारी आत्मसात करने की क्षमता बढ़ती जाती है। दूसरी बात, यह श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच एक जीवंत संवाद था। जब भी श्रीकृष्ण को लगता कि अर्जुन कुछ बातें समझनहीं पा रहा है, तो वे करुणावश उसे दोहरा देते हैं।श्रीकृष्ण आगे कहते हैं, "मेरा गर्भ महत्-ब्रह्म (मूल प्रकृति) है, जिसमें मैं बीज स्थापित करता हूँ; यह सभी प्राणियों के जन्म का कारण है (14.3)। सभी गर्भों में जो भी रूप उत्पन्न होते हैं, प्रकृति उनकी गर्भ (माता) है, और मैं बीज देने वाला पिता हूँ" (14.4)। प्रकृति समस्त सृष्टि की माता है और परमात्मा पिता हैं। परमात्मा का एक छोटा सा अंश (बीज), जिसे आत्मा कहते हैं, प्रकृति को दिया जाता है ताकि प्रत्येक जीव फल-फूल सके। बीज विकास का प्रतीक है जो विभिन्न जीवन रूपों के विकास का मूल है। श्रीकृष्ण ने पहले हमें दूसरों में स्वयं को, स्वयंमें दूसरों को देखने और अंततः उन्हें सर्वत्र देखने के लिए कहा था, क्योंकि सभी प्राणी उनके ही 'बीज' हैं।

श्रीकृष्ण कहते हैं, "जिस प्रकार से एक सूर्य समस्त ब्रह्माण्ड को प्रकाशित करता है उसी प्रकार से आत्मा चेतना शक्ति के साथ पूरे शरीर को प्रकाशित करती है" (13.34)। शरीर में जीवन लाने के लिए आत्मा की आवश्यकता होती है। यह बिजली की तरह है जो उपकरणों में जीवन लाती है। गीता के तेरहवें अध्याय का शीर्षक 'क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग' है जहां श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि भौतिक शरीर को क्षेत्र कहा जाता है जिसके गुणों में अहंकार(मैं कर्ता हूँ), बुद्धि, मन, दस इंद्रियां, इंद्रियों के पांच विषय, इच्छा, घृणा, सुख, दुःख, स्थूल देह का पिंड, चेतना और धृति शामिल हैं। क्षेत्र के ज्ञाता को क्षेत्रज्ञ कहा जाता है। श्रीकृष्ण ने ज्ञान के लगभग बीस पहलुओं का उल्लेख किया है और वे विनम्रता को सबसे आगे रखते हैं जो दर्शाता है कि यह कमजोरी नहीं बल्कि एक सद्गुण है। ज्ञान के अन्य पहलुओं में क्षमा, आत्म-संयम, इंद्रिय वस्तुओं के प्रति वैराग्य, अहंकार का अभाव, अनासक्ति और प्रिय और अप्रिय परिस्थितियों के प्रति शाश्वत समभाव शामिल हैं। श्रीकृष्ण इस ज्ञान के उद्देश्य के बारे में आगे बताते हैं। एक बार जब वह 'उस' को जान लेता है जो जानने योग्य है तो वह आनंद प्राप्त करता है। यह न तो सत् है और न ही असत् है और सभी में व्याप्त होकर संसार में निवास करता है। वह ध्यान, जागरूकता,कर्म या संतों को सुनने के माध्यम से 'उस' को प्राप्त करने का मार्ग बताते हैं। श्रीकृष्ण प्रकृति के बारे में बात करते हैं जो कारण और प्रभाव के लिए जिम्मेदार है। पुरुष अपनी व्याख्या के अनुसार सुख और दुःख के अनुभव के लिए जिम्मेदार है। दोनों अनादि हैं। श्रीकृष्ण भगवद गीता के तेरहवें अध्याय का समापन करते हुए कहते हैं, "जो लोग ज्ञान चक्षुओं से क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के बीच के अन्तर और प्रकृति की शक्ति के बन्धनों से मुक्त होने की विधि जान लेते हैं, वे परम लक्ष्य प्राप्त कर लेते हैं" (13.35)। यह भगवान श्रीकृष्ण का आश्वासन है कि एक बार जब हम क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ की गहरी समझ प्राप्त कर लेते हैं तो हम शाश्वत अवस्था में पहुँच जाते हैं।

श्रीकृष्ण कहते हैं, "जब वे विविध प्रकार के प्राणियों को एक ही परम शक्ति परमात्मा में स्थित देखते हैं और उन सबको उसी से जन्मा समझते हैं तब वे ब्रह्म का ज्ञान प्राप्त करते हैं" (13.31)। समसामयिक वैज्ञानिक समझ के अनुसार ब्रह्माण्ड लगभग 14 अरब वर्ष पूर्व एक बिन्दु से प्रारम्भ हुआ और आज भी विस्तारित हो रहा है। विस्तार की इस प्रक्रिया से बड़ी संख्या में तारे और ग्रह बने। इसने विभिन्न प्रकार के प्राणियों को भी जन्म दिया। यह श्लोक अपने समय की भाषा का प्रयोग करते हुए यही संदेश देता है। हालांकि यह ज्ञान आसानी से प्राप्त किया जा सकता है, यह श्लोक वर्तमान क्षण में 'एक मूल' को देखने की क्षमता को इंगित करता है। हम विभिन्न जीवन रूपों और विभिन्न स्थितियों का सामना करते हैं जिसके परिणामस्वरूप हमारे भीतर कई भावनाएं पैदा होती हैं। जब हम 'एक मूल' का अनुभव करते हैं, तो हम 'मेरा और तुम्हारा' के विभाजन से मुक्त हो जाते हैं। इस श्लोक को मोक्ष की परिभाषा के रूप में भी लिया जा सकता है जो यहां और अभी परम स्वतंत्रता है। श्रीकृष्ण आगे कहते हैं, "परमात्मा अविनाशी है और इसका कोई आदि नहीं है और प्रकृति के गुणों से रहित है। यद्यपि यह शरीर में स्थित है किन्तु यह न तो कर्म करता है और न ही प्रकृति की शक्ति से दूषित होता है (13.32)। आकाश सबकुछ अपने में धारण कर लेता है। जिसे यह धारण किए रहता है उसमें लिप्त नहीं होता। इसी प्रकार से आत्मा शरीर में व्याप्त रहती है फिर भी आत्मा शरीर के धर्म से प्रभावित नहीं होती" (13.33)। ऐसी ही जटिलता को समझाने के लिए श्रीकृष्ण ने कमल के पत्ते का उदाहरण दिया जो पानी के संपर्क में रहने के बावजूद भीगता नहीं है। इसी प्रकार आत्मा भी शरीर के गुणों से प्रभावित नहीं होती। आकाश हमारे चारों ओर है और यह सब कुछ धारण करता है, लेकिन दूषित नहीं होता क्योंकि यह न तो किसी चीज से जुड़ता है और न ही किसी चीज से अपनी पहचान बनाता है। जब भी हम आकाश को देखते हैं तो इस पहलू को याद रखना आवश्यक है और कुछ ध्यान की तकनीकें इस पहलू का उपयोग करती हैं।

ఈ భూలోకంలో జ్ఞానోదయం పొందిన ప్రతి వ్యక్తి చేసిన బోధనల సారాంశమూ సమానత్వమే. పదములు, భాషలు మరియుపద్ధతులలో తేడా ఉండవచ్చు కానీ సమత్వము సాధించుటమే ప్రతి ఒక్కరి సందేశం యొక్క సారాంశము. దీనికి భిన్నంగా సాగిన ఏ ప్రభోధనమైనా, ఆచరణ అయినా మూఢత్వంతో కూడుకున్నది తప్ప మరోటి కాదు.మనస్సు విషయములో ఒక వైపు ఇంద్రియాలు మరియు మరొక వైపు బుద్ధి మధ్య సమతుల్యత సాధించడం. ఒకరుఇంద్రియాల వైపు మొగ్గితే కోరికల్లో మునిగిపోతాడు. మేధావి అయిన వ్యక్తి తగిన చైతన్యం కలిగి ఉంటాడు కానీ అవసరమైనంత కరుణ లేకపోతే ఇతరులను చిన్న చూపు చూసే ప్రమాదం లేకపోలేదు. ఎవరైతే ఇతరుల సుఖ దుఃఖాలను తమవిగా చూడగలుగుతాడో అతడే నిజమైన యోగి అని శ్రీకృష్ణుడు చెప్తారు (6.32). ఇది చైతన్యం, కరుణలు సమపాళ్లల్లో ఉన్న జీవితం. శ్రీకృష్ణుడు బంగారం, రాతి వంటి వాటిని సమానంగా పరిగణించమని చెప్పారు. ఒక ఆవు, ఒక ఏనుగు మరియు కుక్కను ఒకేలా చూడమని చెప్పారు. తర్వాత మిత్రులు, శత్రువులతోసహా అందరినీ సమభావనతో చూడమని చెప్పారు. ప్రతి వ్యక్తితో వ్యవహరించడానికి మూడు వేర్వేరు స్థాయిలు ఉన్నాయి అని గమనిస్తే ఈ బోధనను అర్ధము చేసుకోవడం సులభం. మొదటిస్థాయి దేశం యొక్క చట్టం ముందు సమానత్వం లాంటిది. ఇక్కడ ఇద్దరు వ్యక్తులకు సమానంగా పరిగణించబడే హక్కు ఉంటుంది. మనకు అత్యంత ఆప్తులైన వారు ఆప్తులు కాని వారిగుణగణాలను సమానంగా స్వీకరించగలగటం అవగాహన యొక్క రెండవ స్థాయి. ఇది తల్లిదండ్రులను, అత్తమామలను సమానంగా చూసుకొవడం లాంటిది. ఇతరుల సుఖాలను మన సుఖాలుగాభావించడం, వారి కష్టాలను మన కష్టాలుగా స్పందించడం; మనల్ని ఇతరులతో సమానంగానూ, ఇతరులను మనతో సమానంగానూ చూడగలగటం అనేది సమత్వంలో అత్యున్నత స్థాయి. ఇది చరాచర జీవులను సమానంగా చూడగలిగేసామర్ధ్యం ఉన్నప్పుడు కలిగే కరుణ హృదయ తత్వమే. దీన్నే శ్రీకృష్ణుడు అలౌకిక ఆనందం అని అంటారు. మనస్సు ఈ ప్రశాంత స్థితికి చేరుకున్నప్పుడు రాగద్వేషాలు అదుపులో ఉంటాయి (6.27). ఈ ప్రశాంత చిత్తాన్ని సాధించడానికి ప్రతి నిత్యమూ కృతనిశ్చయంతో ప్రయత్నించాలని శ్రీకృష్ణుడు ఉపదేశిస్తున్నారు (6.23). స్థిరత్వం లేని మనస్సు చంచలత్వంతోవ్యవహరించినా దాన్ని అదుపులోకి తీసుకురావల్సిన అవసరం ఉంది (6.26). ఈ రకమైన ఆధ్యాత్మిక అభ్యాసాన్ని క్రమం తప్పకుండా పాటిస్తూ వెళ్తే అంతులేని అలౌకికానందాన్నిపొందవచ్చని శ్రీకృష్ణుడు చెప్తున్నారు (6.28).

श्रीकृष्ण कहते हैं, "जितने भी चर और अचर सृष्टि तुम्हें दिखाई दे रही हैं वे सब क्षेत्र और क्षेत्र के ज्ञाता का संयोग मात्र हैं (13.27)। जो परमात्मा को सभी जीवों में आत्मा के रूप में देखता है और जो इस नश्वर शरीर में दोनों को अविनाशी समझता है केवल वही वास्तव में देखता है" (13.28)। इसी तरह का वर्णन श्रीकृष्ण ने पहले भी किया था जहां उन्होंने 'सत्' को शाश्वत और 'असत्' को वह बताया जो अतीत में नहीं था और जो भविष्य में भी नहीं होगा (2.16); और हमें उनमें अंतर करने की सलाह दी। हम अपने चारों ओर जो कुछ भी देखते हैं वह नाशवान है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि इस नाशवान के पीछे अविनाशी है। नाशवानता की गहराई में जाकर अविनाशी की खोज करने के बजाय, हम अपना जीवन नाशवान के आधार पर बनाते हैं। यह हवा में महल बनाने जैसा है। नाशवान में स्थायित्व या निश्चितता लाने के हमारे प्रयासों का अंत दुःख में होना तय है। श्रीकृष्ण ने ऐसी स्थिति को अपने द्वारा अपना विनाश के रूप में वर्णित किया और परम गंतव्य तक पहुंचने के लिए भगवान की सर्वव्यापकता का एहसास करने का परामर्श दिया (13.29)। यह बिना आसक्ति या विरक्ति के नाशवान (परिवर्तन) को साक्षी बनकर देखने की आदत विकसित करने के बारे में है; बिना किसी प्रतिरोध के परिवर्तन के साथ सामंजस्य बनाकर रहने के बारे में है। श्रीकृष्ण आगे कहते हैं, "जो यह समझ लेते हैं कि शरीर के समस्त कार्य प्रकृति की शक्ति के द्वारा सम्पन्न होते हैं जबकि देहधारी आत्मा वास्तव में कुछ नहीं करती, केवल वही वास्तव में देखते हैं" (13.30)। नाशवान संसार में, कर्ता के लिए कोई स्थान नहीं है क्योंकि सब कुछ एक बुलबुले की तरह है जो अपने आप उत्पन्न होता है और बाद में नष्ट हो जाता है। गीता में कई बार यह समझाया गया है कि हम कर्म के कर्ता नहीं हैं। प्रकृति से उत्पन्न तीन गुणों का संयोजन और उनकी अंतःक्रिया हमारे चारों ओर दिखाई देने वाले कर्म के लिए जिम्मेदार है। यह बात हमारे जीवन के अनुभवों के माध्यम से जितनी गहराई से हमारे भीतर आत्मसात होती जाती है, हम उतने ही शांतमय होते जाते हैं।

द्रोणाचार्य धनुर्विद्या में निपुण थे जो अपने शिष्य अर्जुन को धनुर्विद्या सिखा रहे थे। एक और छात्र एकलव्य भी द्रोणाचार्य से सीखना चाहता था, जिन्होंने उसे शिक्षा देने से इनकार कर दिया। एकलव्य ने वापस लौटकर द्रोणाचार्य की एक मूर्ति स्थापित की और मूर्ति को वास्तविक गुरु मानकर धनुर्विद्या सीखी। कहा जाता है कि वह अर्जुन से भी श्रेष्ठ धनुर्धर निकला। यह कहानी गुरु-शिष्य के रिश्ते और ज्ञान प्राप्ति के क्षेत्र में कई पहलुओं को दर्शाती है। यह कहानी हमें यह समझने में मदद करती है जब श्रीकृष्ण कहते हैं,"कुछ लोग ध्यान द्वारा अपने हृदय में बैठे परमात्मा को देखते हैं और कुछ लोग ज्ञानयोग द्वारा, जबकि कुछ अन्य लोग कर्मयोग द्वारा देखने का प्रयत्न करते हैं (13.25)। कुछ अन्य लोग ऐसे भी होते हैं जो आध्यात्मिक मार्ग से अनभिज्ञ होते हैं लेकिन वे अन्य संत पुरुषों से श्रवण कर भगवान की आराधना करने लगते हैं। वे भी धीरे-धीरे जन्म और मृत्यु के सागर को पार कर लेते हैं" (13.26)। एकलव्य की तरह हम भी परमात्मा को अपने भीतर प्रत्यक्ष रूप से अनुभव करते हैं या अर्जुन की तरह संतों की वाणी सुनकर अनुभव कर सकते हैं। आध्यात्मिक यात्रा में कोई एक मार्ग नहीं है। किसी के व्यक्तित्व के आधार पर, यह व्यक्ति-दर-व्यक्ति अलग होता है। हृदय उन्मुख व्यक्ति के लिए, यह भक्ति या समर्पण के माध्यम से होता है। बुद्धि उन्मुख व्यक्ति के लिए यह जागरूकता (सांख्य) का मार्ग है। मन उन्मुख व्यक्ति के लिए यह कर्म का मार्ग है। हालांकि इन मार्गों के दृष्टिकोण, अनुभव और भाषा काफी भिन्न होती हैं, लेकिन ये सभी परमात्मा तक ले जाते हैं। भगवद गीता में श्रीकृष्ण इन सभी मार्गों के बारे में बताते हैं और हमारे व्यक्तित्व के आधार पर मार्ग निर्धारित होता है। 'संतों की वाणी सुनने के माध्यम से बोध' का मार्ग कुछ प्रश्न पैदा करता है कि संत या गुरु कौन हैं और उनकी पहचान कैसे की जाए। इससे पहले श्रीकृष्ण ने हमें साष्टांग प्रणाम (विनम्रता), प्रश्न पूछना (खुद के हर पहलू पर) और सेवा विकसित करने की सलाह दी थी (3.34)। एकलव्य ने इन गुणों को विकसित किया और सीखना अपने आप ही हुआ क्योंकि सृष्टि ही गुरु बन गया।

వ్యక్తీకరించబడిన అంటే భౌతిక ప్రపంచంలో, పరివర్తనం శాశ్వతము. అవ్యక్తమైన లేదా ఆత్మ ఎల్లప్పుడూ మార్పు లేకుండాఉంటుంది. ఈ రెండు రకాల వ్యవస్థల మధ్య సమన్వయం, సమతుల్యం సాధించటానికి ఓ పద్ధతి అవసరం. ఈ పధ్ధతి ఓ స్థిరమైన కేంద్రంను ఆధారం చేసుకుని చక్రం తిరగడానికి బాల్ బేరింగ్ వ్యవస్థ తీసుకొనివచ్చే సమన్వయము లాంటిది. ఈ పద్ధతికి మరో ఉదాహరణ ఏమిటంటే కారులో ఉండే గేరు బాక్స్. అది కారు, ఇంజనుల వేర్వేరు వేగాల మధ్య సమన్వయము తెచ్చి ప్రయాణాన్ని సాధ్యము చేస్తుంది. నిరంతరం మారేబాహ్య పరిస్థితులు మరియు నిశ్చలమైన ఆత్మ మధ్య ఇంద్రియాలు, మనస్సు, బుద్ధి సమన్వయము తీసుకువస్తాయి. ఇంద్రియ వస్తువుల కంటే ఇంద్రియాలు శ్రేష్ఠమైనవని, ఇంద్రియాల కంటే మనస్సు శ్రేష్ఠమైనది, మనస్సు కంటే బుద్ధి శ్రేష్ఠమైనది, బుద్ధి కంటే కూడా ఆత్మ శ్రేష్ఠమైనదని శ్రీకృష్ణుడు వీటి మధ్య ఒక ఆరోహణ క్రమాన్ని వివరిస్తారు (3.42).ఇంద్రియాల యొక్క భౌతిక భాగములు భౌతిక ప్రపంచంలోని మార్పులకు యాంత్రికంగా ప్రతిస్పందిస్తూ ఉంటాయి. మనస్సు అనేది జ్ఞాపకశక్తితోపాటు ఇంద్రియాల యొక్క నియంత్రక భాగముల కలయిక. మనలను సురక్షితంగా ఉంచడానికి ఇంద్రియాల యొక్క భౌతిక భాగం ద్వారా వచ్చే స్పందనలనుమన మనస్సు పరిశీలిస్తూ ఉంటుంది. ఇక్కడ మన మనస్సును ఒక వైపు ఇంద్రియ స్పందనలు రెండవ వైపు బుద్ధి నియంత్రిస్తూ ఉంటాయి. ఇంద్రియ స్పందనలు నియంత్రిస్తూ ఉంటే అది ఒకబాధాకరమైన ప్రతిచర్య జీవితం అవుతుంది. మన బుద్ధి మన మనస్సును నియంత్రిస్తూ ఉంటే అది అవగాహనతో కూడిన ఆనందమయ జీవితం అవుతుంది. అందుకే మనస్సును స్వయంలో స్థిరపరచడానికి బుద్ధిని ఉపయోగించే అభ్యాసాన్ని ప్రారంభించమని శ్రీకృష్ణుడు చెప్పారు (6.25). ఈ అభ్యాసాన్ని దృఢ నిశ్చయముతో మరియు ఉత్సాహంతోచేయమని ప్రోత్సహిస్తున్నారు (6.23). సమకాలీన సాహిత్యం కూడా ఏదైనా నైపుణ్యం సాధించడానికి పది వేల గంటల సాధన అవసరమని సూచిస్తుంది.ఈ ప్రక్రియలో, మనం సంకల్పం కూడా వదిలివేసి ఇంద్రియాలను నిగ్రహించాలి (6.24). ఇంద్రియాలను నిగ్రహించడం అనేది మనకు నచ్చిన ఇంద్రియ స్పందనలను పొందాలనే కోరికను నిరోధించడం తప్ప మరొకటి కాదు. ఒకసారి మనము ఇంద్రియాలకు అతీతమైన పరమానందాన్ని పొందితే ఎటువంటిదుఃఖాలు కూడా మనలను చలింపజేయవు అని శ్రీకృష్ణుడు హామీ ఇచ్చారు (6.22).

श्रीकृष्ण कहते हैं, "इस शरीर में स्थित पुरुष को साक्षी (दृष्टा),अनुमन्ता, भर्ता, भोक्ता, महेश्वर और परमात्मा भी कहा जाता है'' (13.23)। इस जटिलता को समझने के लिए आकाश सबसे अच्छा उदाहरण है। इसे इसके स्वरूप के आधार पर अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है जैसे एक कमरा, एक घर, एक बर्तन आदि। मूलतः, आकाश एक है और बाकी इसकी अभिव्यक्तियां हैं।श्रीकृष्ण आश्वासन देते हैं, "वे जो परमात्मा, जीवात्मा और प्रकृति के सत्य और तीनों गुणों की अन्तःक्रिया को समझ लेते हैं वे पुनः जन्म नहीं लेते। उनकी वर्तमान स्थिति चाहे जैसी भी हो वे मुक्त हो जाते हैं" (13.24)। प्रकृति में सबकुछ गुणों के कारण घटित होता है और पुरुष उन्हें दुःख और सुख के रूप में अनुभव करता है। इस बात की समझ हमें सुख और दुःख के बीच झूलने की दुर्गति से मुक्ति प्रदान करती है। श्रीकृष्ण ने पहले मुक्ति के बारे में एक अलग दृष्टिकोण से समझाया कि सभी स्थितियों में गुणों के द्वारा ही कर्म किए जाते हैं; जो अहंकार से मोहित हो जाता है वह सोचता है 'मैं कर्ता हूँ' (3.27)। जो यह जानता है कि गुणों के साथ गुण परस्पर क्रिया करते हैं, वह मुक्त हो जाता है (3.28)। मुक्ति का मतलब कुछ भी करने की स्वतंत्रता है। इससे यह तर्क सामने आता है कि यदि पाप या अपराध कहे जाने वाले कार्यों की अनुमति दी जाती है तो समाज कैसे जीवित रह सकता है। परन्तु इस तर्क में कमजोरी है कि यह घृणा को दबाकर पोषित रखने की अनुमति देता है। यह स्थिति तबतक रहेगी जबतक दबाकर रखी गई घृणा को व्यक्त न किया जाए। लेकिन श्रीकृष्ण कहते हैं कि उस घृणा को ही त्याग दो और अस्तित्व के साथ सामंजस्य अपने आप हो जाएगा। मानव शरीर एक चमत्कार है। हमारे शरीर में लगभग तीस ट्रिलियन कोशिकाएं और अन्य तीस ट्रिलियन बैक्टीरिया हैं जो आपस में तालमेल बनाए रखते हैं। सामंजस्य का सबसे अच्छा उदाहरण मानव शरीर है। इस तालमेल को बनाए रखने के लिए हमें कोई विशेष प्रयास नहीं करना पड़ता है। ऐसा शरीर की कोशिकाओं व बैक्टीरिया आदि के एकत्व के कारण होता है। मुक्ति और कुछ नहीं बल्कि चारों ओर एकत्व की अनुभूति है।

श्रीकृष्ण कहते हैं, "जान लो कि प्रकृति और पुरुष दोनों अनादि हैं। तीनों गुण और शरीर में होने वाले विकार (विकास या परिवर्तन) प्रकृति से पैदा होते हैं (13.20)। प्रकृति कारण और प्रभाव के लिए जिम्मेदार है, पुरुष सुख और दुःख के अनुभव के लिए जिम्मेदार है (13.21)। प्रकृति के प्रभाव में, पुरुष गुणों का अनुभव करता रहता है। गुणों के प्रति आसक्ति ही विभिन्न योनियों में जन्म का कारण है" (13.22)। परिवर्तन प्रकृति का नियम है जहां आज की स्थितियां कल की परिस्थितियों से भिन्न होती हैं। जबकि परिवर्तन नियम है, हम परिवर्तन के प्रति अपने प्रतिरोध के कारण दुःख पाते हैं क्योंकि इसके लिए स्वयं को बदलना पड़ता है। अतीत के बोझ और भविष्य से अपेक्षाओं के बिना वर्तमान क्षण में जीना ही इस प्रतिरोध से पार पाने का तरीका है। प्रकृति 'कारण और प्रभाव' के लिए जिम्मेदार है जिसे आमतौर पर भौतिक नियम कहा जाता है। पुरुष उन्हें सुख और दुःख के रूप में अनुभव करता है। जब पत्थर को ऊपर फेंकते हैं, तो वह नीचे आता है और जब बीज बोते हैं, तो अंकुरण होता है और यह सूची अनंत है। जब फूल खिलते हैं तो हमारी व्याख्या ही उन्हें सुंदर बनाती है। इसी प्रकार, मृत्यु या विनाश के दृश्य की व्याख्या दर्दनाक के रूप में की जाती है। अपनी-अपनी मनोस्थिति के आधार पर, एक ही स्थिति के लिए अलग-अलग व्यक्तियों की व्याख्याएं अलग-अलग होती हैं। परिणामस्वरूप, व्यक्ति सुख और दुःख; मिजाज में बदलाव और दोषारोपण के खेल से गुजरता है। श्रीकृष्ण ने पहले ऐसी व्याख्याओं को क्षणिक (अनित्य) बताया था और हमें उनको सहन करने को सीखने की सलाह दी थी (2.14)। सत्त्व, तमो और रजो गुण प्रकृति से उत्पन्न होते हैं। उनके प्रभाव में पुरुष विभिन्न समयों पर अलग-अलग अनुपातों में इन गुणों का अनुभव करता रहता है। यह अनुभव या भ्रम हमें विश्वास दिलाता है कि हम कर्ता हैं। हमारा आपसी बर्ताव गुणों के बीच परस्पर क्रिया का परिणाम हैं। इस सन्दर्भ में श्रीकृष्ण हमें बार-बार इन गुणों से परे जाकर गुणातीत बनने की सलाह देते हैं

మన మెదడు ఓక అద్భుతమైన అవయవం. దానికున్న ఓక ముఖ్యమైన లక్షణం ఏమిటంటే దానికి నొప్పి ఏమిటో తెలీదు ఎందుకంటే నొప్పిని గురించి మెదడుకు సూచనలు పంపే నోసిసెప్టార్లు మెదడులో ఉండవు. న్యూరో సర్జన్లు ఈ లక్షణాన్ని ఉపయోగించి మనిషి మేలుకొని ఉన్నప్పుడు మెదడు యొక్క శస్త్రచికిత్స చేస్తారు.శారీరక నొప్పులు మరియు ఆహ్లాదాలు మన మెదడు యొక్క తటస్థ స్థితితో పోల్చడం వలన కలిగే అనుభవాలు. అలాగేమానసిక భావాలకు కూడా ఇదే వర్తిస్తుంది. మనందరిలో ఒక తటస్థ బిందువు ఉంటుంది. ఈ తటస్థ బిందువుతో పోలిక సుఖము, దుఃఖముల యొక్క ధ్రువణాలకు దారి తీస్తుంది. ఈ నేపథ్యం శ్రీకృష్ణుడు చెప్పినది అర్థం చేసుకోవడానికి మనకు సహాయపడుతుంది, "ధ్యానయోగ సాధనం ద్వారానిగ్రహింపబడిన మనస్సు స్థిరమైనప్పుడు యోగి అంతరాత్మను దర్శనం చేసుకొని ఆత్మసంతృప్తి చెందుతాడు" (6.20).స్థిరపడటం అనేది కీలకం. అంటే చంచలమైన లేదా ఊగిసలాడే మనస్సును స్థిరపరచడం. దానిని సాధించేందుకుశ్రీకృష్ణుడు నిగ్రహమును పాటించాలని సూచిస్తారు. నిగ్రహము అంటే మన భావాలను అణచివేయడం లేదా వాటి వ్యక్తీకరణ కాదు. ఇది అవగాహనతో మనలో ఉత్పన్నమయ్యే ఈ భావాలనుసాక్షి లాగా చూస్తూ ఉండడం. మనం ఎదుర్కొన్న గత పరిస్థితులను విశ్లేషించడం ద్వారా ఈ నిగ్రహాన్ని సులభంగా సాధించవచ్చు.ఒకసారి మనం నిగ్రహం అనే కళలో ప్రావీణ్యం పొందిన తర్వాత, ఆ తటస్థ బిందువు అంటే అత్యున్నత ఆనందాన్ని చేరుకోవడానికి సుఖము, దుఃఖము యొక్క ధ్రువణాలను అధిగమిస్తాము. ఈ విషయంలో శ్రీకృష్ణుడు ఇలా అంటారు,"ఇంద్రియాతీతమైన మరియు పవిత్ర సూక్ష్మ బుద్ధి ద్వారా మాత్రమే గ్రాహ్యమైన బ్రహ్మానందమును అనుభవించుచు దానియుందే స్థితుడైయున్న యోగి వాస్తవికతనుండి ఏమాత్రము విచలితుడు కానేకాడు" (6.21).పరమానందం ఇంద్రియాలకు అతీతమైనది. ఈ స్థితిలో, ఇతరుల నుండి ప్రశంసలు లేదా రుచికరమైన ఆహారం మొదలైనవాటి అవసరం ఉండదు. మనమందరం ఈ ఆనందాన్ని ధ్యానంలో లేదా నిష్కామ కర్మలు చేసిన క్షణాలలో పొందుతాము. మన భాద్యత ఏమిటంటే ఈ క్షణాలను గుర్తించి మన అన్ని జీవిత క్షణాలలో విస్తరింపజేయడం.

श्रीकृष्ण कहते हैं, "परमात्मा सबका पालनकर्ता, संहारक और सभी जीवों का जनक है। वे अविभाज्य हैं, फिर भी सभी जीवित प्राणियों में विभाजित प्रतीत होते हैं (13.17)। वे समस्त प्रकाशमयी पदार्थों के प्रकाश स्रोत हैं, वे सभी प्रकार की अज्ञानता के अंधकार से परे हैं। वे ज्ञान हैं, वे ज्ञान का विषय हैं और ज्ञान का लक्ष्य हैं। वे सभी जीवों के हृदय में निवास करते हैं (13.18)। इसे जानकर मेरे भक्त मेरी दिव्य प्रकृति को प्राप्त होते हैं" (13.19)। श्रीकृष्ण ने पहले कहा था कि जो योग में सिद्धि प्राप्त करता है वह ज्ञान को स्वयं में ही पाता है (4.38)। इसी विषय का श्रीकृष्ण "वह सभी के दिलों में वास करते हैं" के रूप में उल्लेख करते हैं। श्रद्धावान और जितेंद्रिय ज्ञान पाकर परम शांति प्राप्त करते हैं (4.39)। श्रद्धा से रहित अज्ञानी नष्ट हो जाता है और उसे इस लोक या परलोक में कोई सुख नहीं मिलता (4.40)। परमात्मा सभी जीवित प्राणियों में विभाजित प्रतीत होते हैं, जबकि वे अविभाज्य हैं। अस्तित्व के स्तर पर इस तत्त्व को समझने में असमर्थता हमें तकलीफ देती है। यह कहावती हाथी और पांच अंधे लोगों की तरह है जो हाथी के केवल एक हिस्से को ही समझ पाते हैं जिससे मतभेद और विवाद पैदा होते हैं। वर्तमान वैज्ञानिक समझ भी पूरे ब्रह्मांड में व्याप्त क्वांटम क्षेत्र के संदर्भ में इस ‘अविभाज्यता' की ओर इशारा करती है। पदार्थ या कण क्वांटम क्षेत्र में उत्तेजना के अलावा और कुछ नहीं हैं। इस 'अविभाज्यता' या एकता को विकसित करने का एक आसान तरीका यह है कि बिना कोई धारणा बनाए दूसरों के दृष्टिकोण को समझना शुरू करें और शंका होने पर प्रश्न करें। जब कोई माता या पिता बनता है तब शिशु की आवश्यकताओं को समझने के लिए या जब कोई कार्यस्थल में उच्च पदों पर पहुंचता है तब यह स्वाभाविक रूप से आता है। कुंजी यह है कि इस सीख को जीवन के हर पहलू में विस्तारित करना है। विपरीतों को एक में मिलाना ही परमात्मा को पाने की कुंजी है क्योंकि वह दोनों ही हैं। यह कुछ और नहीं बल्कि ‘मन रहित' होने की स्थिति है जहाँ मन विभाजन करना बंद कर देता है।

ఆధ్యాత్మిక మార్గం గురించి ఒక సాధారణ భావన ఏమిటంటే దానిని అనుసరించడం కష్టతరమైనది. అందువలననే, చిన్న ప్రయత్నాల ద్వారా కర్మయోగంలో పెద్ద లాభాలను పొందగలమని శ్రీకృష్ణుడు ఇంతకుముందు హామీ ఇచ్చారు(2.40). దీనిని మరింత సులభతరం చేస్తూ శ్రీకృష్ణుడు ఈ విధముగా చెప్పారు, "ఆహారవిహారాదులయందును, కర్మాచరణముల యందును, జాగ్రత్స్వప్నాదుల యందును, యథాయోగ్యముగా ప్రవర్తించు వానికి దుఃఖనాశకమగు ధ్యాన యోగము సిద్ధించును" (6.17). యోగము లేదా ఆధ్యాత్మిక మార్గం అంటే ఆకలితో ఉన్నప్పుడు తినడం; పని చేయడానికి సమయం వచ్చినప్పుడు పని చేయడం; నిద్రించవలసిన సమయంలో నిద్రపోవడం మరియు అలిసిపోయినప్పుడు విశ్రాంతి తీసుకోవడం అంత సులభం. ఇంతకు మించినది ఏదైనా మనకు మరియు ఇతరులకు మనం చెప్పే కథలు మాత్రమే.వృద్ధుల కంటే శిశువుకు ఎక్కువ నిద్ర అవసరం ఉంటుంది. ఆహారానికి సంబంధించి మన అవసరాలు రోజులోని శారీరక శ్రమ ఆధారంగా మారవచ్చు. శ్లోకములో ఉల్లేఖించబడిన ‘యథాయోగ్యము' అంటే వర్తమానంలో అవగాహనతో జీవించడము అని సూచిస్తుంది. దీనినే అంతకుముందు కర్తవ్య కర్మలు (6.1) లేదా శాస్త్రవిహిత కర్మలు (3.8) గా సూచించబడింది.దీనికి భిన్నంగా మన మెదడు విషయాలను ఆధారంగాతీసుకొని విస్తృతంగా ఆలోచించి దానికి మన ఊహాజనిత సామర్ద్యాన్ని జోడించి ఆ విషయాల చుట్టూ సంక్లిష్టమైన కథనాలు అల్లుతుంది. మనకు మనం చెప్పుకునే ఈ కథలే మనలో ఒకరినినాయకుడిగానూ మరొకరిని ప్రతి నాయకుడుగానూ, కొన్ని పరిస్థితులను ఆహ్లాదమైనవిగానూ, మరికొన్నింటిని కష్టదాయక మైనవిగానూ చూపిస్తాయి. ఈ కథనాలే మన మాటలను,ప్రవర్తనను నియంత్రిస్తాయి. అందుకే శ్రీకృష్ణుడు ఇటువంటి కథనాలు చెప్పే మనస్సును నియంత్రణలో పెట్టుకోవాలని ఉపదేశిస్తున్నారు. మనస్సును అదుపులో పెట్టుకోవటానికి అన్ని రకాల కోరికలను త్యజిస్తే పరమాత్మతో లీనం అవుతామనిబోధిస్తున్నారు (6.18). "గాలి లేని చోట దీపం ఎలా నిశ్చలముగా ఉండునో అలాగే యోగికి వశమైయున్న చిత్తము పరమాత్మ ధ్యానమున నిమగ్నమైయున్నప్పుడు నిర్వికారముగా, నిశ్చలముగానుండును" అని శ్రీకృష్ణుడు చెప్తున్నారు (6.19). శ్రీకృష్ణుడు ఇంతకూముందు తాబేలు (2.58); నదులు మరియు మహాసముద్రం యొక్క (2.70) ఉదాహరణలను ఇచ్చారు. ఇక్కడ నదులు సముద్రంలోకి ప్రవేశించిన తర్వాత వాటి ఉనికిని కోల్పోతాయి. అనేక నదులు ప్రవేశించిన తర్వాత కూడా సముద్రం ప్రశాంతంగా ఉంటుంది. అదేవిధంగా,స్థిరంగా ఉన్న యోగి మనస్సులో కోరికలు ప్రవేశించినప్పుడు వాటి ఉనికిని కోల్పోతాయి.

एक बार एक पिता अपने दस साल के बेटे को खेल के मैदान में ले गया। उसने एक गेंद फेंकी और खेल का नियम यह था कि लड़के को गेंद वापस लाकर अपने पिता को देना है। मैदान खिलौनों से भरा था। रास्ते में, लड़के का ध्यान एक खिलौने की तरफ आकर्षित होता है और वह उसके साथ खेलना शुरू कर देता है। तब उसके पिता उसे गेंद के बारे में याद दिलाने के लिए आवाज लगाते हैं। वह खिलौने को छोड़कर फिर से गेंद के पीछे दौड़ना शुरू कर देता है। खेल के मैदान में अन्य बच्चे भी थे। इस बार लड़के को एक और आकर्षक खिलौना मिल जाता है और वह उससे खेलना शुरू कर देता है। तभी एक ताकतवर बच्चा आता है और उससे खिलौना छीन लेता है। इस पर लड़का रोने लगता है। अगली बार, लड़का खुद ही दूसरे छोटे बच्चे से खिलौना छीन लेता है। पूरे खेल में खिलौनों के लिए बच्चों के बीच झगड़े होते रहते हैं। इस दौरान पिता बेटे के ठीक पीछे खड़ा रहता है। लेकिन उस लड़के के लिए जो खिलौनों में खोया हुआ है, उसके पिता बहुत निकट होकर भी बहुत दूर हैं। यह कहानी हमें यह समझने में मदद करती है जब श्रीकृष्ण कहते हैं,"भगवान सभी के भीतर एवं बाहर स्थित हैं चाहे वे चर हों या अचर। वे सूक्ष्म हैं और इसलिए वे हमारी समझ से परे हैं। वे अत्यंत दूर हैं लेकिन वे सबके निकट भी हैं" (13.16)। उपरोक्त कहानी में पिता की तरह, वह (श्रीकृष्ण) हमारे जीवन की पूरी यात्रा में ठीक हमारे पीछे हैं और हमें बस पीछे मुड़कर देखना है। इसके लिए जब हम दुनियावी आकर्षणों में खो जाते हैं, प्रभु विभिन्न अनुभव भेजकर हमारी सहायता करते हैं। हमें याद दिलाने के लिए वह कठिन परिस्थितियां देते हैं जैसे पिता लड़के पर चिल्लाते हैं। जब श्रीकृष्ण कहते हैं कि वह समझ के बाहर हैं, तो इसका मतलब यह है कि हम हमारी इंद्रियों की सीमाओं के कारण उनको समझ नहीं पाते हैं। वे अनुभवों के माध्यम से प्राप्त हो सकते हैं लेकिन व्याख्या के माध्यम से नहीं। किसी ऐसे व्यक्ति के लिए जिसने कभी नमक या चीनी नहीं चखा,कोई भी व्याख्या उनके स्वाद को समझने में मदद नहीं करेगी। उनके स्वाद को समझने का एकमात्र तरीका उनको चखना है यानी जागरूकता के साथ उनका अनुभव करना है।

శ్రీకృష్ణుడు, మీరు మీ స్వంత మిత్రుడు లేదా మీ స్వంతశత్రువు అని చెప్పారు (6.6). మన స్వంత స్నేహితుడిగా మారడానికి ఇంద్రియాలను నియంత్రించడం ద్వారా (6.8) సుఖ-దుఃఖ భావాల పట్ల (6.7), బంగారు-రాయి వంటి వస్తువుల పట్ల (6.8) మరియు స్నేహితులు-శత్రువుల వంటి వ్యక్తుల పట్ల (6.9),సమానత్వ భావముతో ఉండాలని శ్రీకృష్ణుడు సూచించారు. దీనితోపాటు ధ్యాన మార్గమును కూడా అనుసరించవచ్చని శ్రీకృష్ణుడు చెప్పారు (6.10-6.15).శ్రీకృష్ణుడు సౌకర్యాల మీద ఆశ లేకుండా ఏకాంతంగా ఉంటూ (6.10), అతి తక్కువగా లేదా ఎత్తుగా లేని పరిశుభ్రమైన ప్రదేశంలోకూర్చుని (6.11), మనస్సును నియంత్రణలో ఉంచుకొని, వెన్నెముక, మెడను నిటారుగా ఉంచి, చుట్టూ చూడకుండా (6.12-6.13), నిశ్శబ్దంగా, భయం లేకుండా, ఏకాగ్రతతో ఉండాలి అని చెప్పారు (6.14). నిరంతరం తన అంతరాత్మతో ఐక్యతను కోరుకోవడం ద్వారా ఒక వ్యక్తి పరమ శాంతిని పొందుతాడని శ్రీకృష్ణుడు చెప్పారు (6.15).ఇంద్రియ, ఇంద్రియ విషయముల సంయోగము తో కలిగేతాకిడి వలన మనకు సమత్వాన్ని సాధించడం కష్టమవుతుంది. అందువలన ఏకాంతం తాత్కాలిక ఉపశమనం కలిగిస్తుంది. మనం శారీరకంగా ఒంటరిగా ఉన్నప్పటికీ మనము చేసే పనులను, పరిస్థితులను, వ్యక్తులను మానసికంగా మనతో పాటుధ్యానానికి తీసుకువెళ్లే అవకాశం ఉంది. మనం వారిని మానసికముగా కూడా వదిలిపెట్టి ఏకాంతంగా ఉండగలగాలని ఈ శ్లోకం (6.10) పేర్కొంటుంది. చివరికి, ఇది యుద్ధభూమిలో అర్జునుడు మానసిక ఏకాంతాన్ని సాధించినట్లే.ధ్యానం చేసే ముందు మనము భౌతిక సౌకర్యాలు, ఆస్తులను దానం చేయమని కాదు. వాటితో మన అంతర్లీన అనుబంధాన్ని త్యజించి అవసరమైనప్పుడు వాటిని ఉపయోగకరమైన వస్తువులుగా వాడుకోవడం తప్ప మరేమి కాదు. ఇది వాటిని 'నేను', 'నాది' లో భాగం చేయకపోవడమే.శ్రీకృష్ణుడు భయాన్ని తొలగించుకోమని సలహా ఇస్తున్నారు. మన ప్రాథమిక భయం ఏమిటంటే వస్తువులు లేదా వ్యక్తులను కోల్పోతామనే భయం. ఇది 'నేను', 'నాది' యొక్క పాక్షికమరణమే తప్ప మరొకటి కాదు. మరోవైపు, ధ్యానంలో మనము ఆలోచనలపై, వస్తువులపై యాజమాన్యం యొక్క భావాన్ని వదిలిపెట్టి వ్యక్తుల నుండి దూరంగా, ఒంటరిగా ఉండాలి. అందువల్ల, మోక్షం అనే శాశ్వతమైన ధ్యాన స్థితిని పొందే మార్గంలో భయం గురించి అవగాహన ఉండాలనిశ్రీకృష్ణుడు చెప్పారు.

जीवित रहने के लिए जिज्ञासा आवश्यक है। वर्त्तमान के संदर्भ में,अपने व्यावसायिक और व्यक्तिगत जीवन में अद्यतन (up-to-date)रहने की उम्मीद की जाती है। अर्जुन प्रश्न करते हैं कि क्या जानने योग्य है (13.1)। इसके बारे में, श्रीकृष्ण ने पहले उल्लेख किया था कि "जब 'उसे'जान लेते हैं तो जानने के लिए कुछ भी नहीं बचता" (7.2)। श्रीकृष्ण कहते हैं, "जो जाननेयोग्य है तथा जिसको जानकर मनुष्य परमानन्द को प्राप्त होता है उसको भलीभांति कहूंगा। वह अनादिवाला परमब्रह्म न सत् ही कहा जाता है न असत् ही (13.13)। वह सब ओर हाथ-पैर वाला, सब ओर नेत्र, सिर और मुख वाला तथा सब ओर कान वाला है; क्योंकि वह संसार में सबको व्याप्त करके स्थित है (13.14)। वह सम्पूर्ण इन्द्रियों के विषयों को जानने वाला है, परन्तु वास्तव में सब इन्द्रियों से रहित है तथा आसक्ति रहित होने पर भी सबका धारण-पोषण करने वाला और निर्गुण होने पर भी गुणों को भोगनेवाला है" (13.15)। मृत्यु का भय हमारे सभी भयों का आधार है। प्रतिष्ठा या संपत्ति की हानि भी एक प्रकार की मृत्यु है। श्रीकृष्ण आश्वासन देते हैं कि हम परम आनंद की अवस्था पाते हैं क्योंकि एक बार 'उसे' जान लेने के पश्चात हम सभी प्रकार के भय से मुक्त हो जाते हैं। इससे पहले, श्रीकृष्ण ने 'सत्' को शाश्वत बताया और 'असत्' को वह जो अतीत में नहीं था और जो भविष्य में नहीं होगा (2.16); और उनके बीच अंतर करने को सीखने के लिए कहा। इस जटिलता को समझने के लिए अक्सर रस्सी-सांप समरूपता का हवाला दिया जाता है। अब श्रीकृष्ण कहते हैं, वह 'सत्' और 'असत्' दोनों हैं। पहला कदम इन दोनों को अलग करने की क्षमता को विकसित करना है। यह एहसास करना है कि वह दोनों ही हैं। इसी प्रकार वह सगुण (रूप) और निर्गुण (निराकार) दोनों है। सर्वत्र आँख और कान होने के कारण वे सबकुछ अनुभव कर सकते हैं। सर्वत्र हाथ होने के कारण उनके मददगार हाथ उन सभी लोगों के लिए उपलब्ध हैं जो श्रद्धा और भक्ति के साथ उनकी शरण में आते हैं। हमारा दिमाग विभाजन करने के लिए प्रशिक्षित है जबकि विरोधाभासों में एकता ही 'जानने योग्य' है। यह सभी रंगों के मिश्रण से सफेद रंग का बनना या प्रकाश की तरंग-कण द्वैतता के जैसा है।

శ్రీకృష్ణుడు బంగారం, రాయి మరియు మట్టిని సమదృష్టితో చూడమని చెప్పిన తర్వాత (6.8), అయన ఈ సమత్వాన్ని గురించి మరింత విస్తారంగా ఇలా చెప్పారు, "సుహృదులయందును, మిత్రులయందును, శత్రువులయందును, ఉదాసీనులయందును, మధ్యస్థుల యందును, ద్వేషింపదగినవారి యందును, బంధువుల యందును, ధర్మాత్ములయందును, పాపులయందును, సమబుద్ధి కలిగియుండువాడు మిక్కిలి శ్రేష్ఠుడు" (6.9). శ్రీకృష్ణుడు బాహ్య విషయాలను, పరిస్థితులను సమదృష్టితో చూడమని చెప్పారు. ఆ తర్వాత మన జీవితాల్లోని వ్యక్తుల గురించి ఉల్లేఖిస్తూ స్నేహితులు మరియు శత్రువులు; ధర్మాత్ములు మరియు పాపులు; అపరిచితులు మరియు బంధువులను సమానంగా పరిగణించమని చెప్పారు. నిశితంగా పరిశీలిస్తే ఇవన్నీ మనం మన చుట్టూ ఉన్న వ్యక్తులను వర్గీకరిస్తామని మరియు వారి పట్ల మన ప్రవర్తన ఈ వర్గీకరణ మీద ఆధారపడి ఉంటుందని సూచిస్తుంది. ఆసక్తికరమైన విషయమేమిటంటే మనకు స్నేహితుడు మరొక వ్యక్తికి శత్రువు కావచ్చు; మన స్నేహితుడు రేపు మనకు శత్రువు కావచ్చు. అంటే ఈ వర్గీకరణలన్నీ సందర్భోచితమైనవి లేదా పక్షపాతంతో ఉంటాయని సూచిస్తుంది. అందువల్ల, ఈ వర్గీకరణలను, విభజనలను వదిలివేసి వాటిని సమతుల్యముగా చూడాలని శ్రీకృష్ణుడు సూచిస్తున్నారు.విషయాలు, వ్యక్తులు మరియు సంబంధాల యొక్క విషయములో సందేశం ఏమిటంటే వ్యక్తులు మరియు సంబంధాలను వినియోగ వస్తువులుగా పరిగణించకూడదు. తెగిపోయిన, పాడైపోయిన సంబంధాలను పరిశీలించి చుస్తే, తగిన గౌరవం ఇవ్వకుండా వారిని ఒక వినియోగ వస్తువుగా వాడుకున్నారనేదే ఈ సంబంధాలలో చేదు అనుభవాలను పొందిన వారి బాధ."అతిగా తినేవాడికి, ఏ మాత్రమూ తినని వాడికి, అతిగా నిద్రించువాడికి, ఎల్లప్పుడూ మేల్కొని ఉన్నవారికి ఈ యోగసిద్ధి కలగదు" అని శ్రీకృష్ణుడు చెప్పారు (6.16). ఇక్కడ తినడం అనేది పంచేంద్రియాల వినియోగమునకు ఉదాహరణగా తీసుకోవచ్చు. మనము మనస్సును, నాలుకను సంతృప్తిపరచడానికి తింటాము కాని ఆరోగ్యానికి దారితీసే శరీర అవసరాలకు అనుగుణంగా కాదని బాగా విదితమైనది. దీని వలన మనకు స్థూలకాయం వస్తుంది మరియు అనారోగ్యానికి లోనవుతాము. మన దుర్భాష మరియు ఇతర ఇంద్రియాలను అతిగా ఉపయోగించడం అనేక దుస్థితిలకు దారి తీస్తుంది. అందుకే శ్రీకృష్ణుడు ఇంద్రియాల వినియోగంలో సమతుల్యత గురించి బోధించారు.

ज्ञान के बारे में अर्जुन के अनुरोध के जवाब में श्रीकृष्ण कहते हैं, "विनम्रता, दम्भहीनता, अहिंसा, क्षमा, मन-वाणी आदि की सरलता, गुरु की सेवा,पवित्रता, दृढ़ता, आत्मसंयम (13.8); इंद्रिय विषयों के प्रति वैराग्य, अहंकार रहित होना, जन्म, रोग, बुढ़ापा और मृत्यु के दोषों की अनुभूति (13.9); अनासक्ति, सन्तान, स्त्री, घर या धन आदि वस्तुओं की ममता से मुक्ति, प्रिय और अप्रिय प्राप्ति में सदा ही शाश्वत समभाव, ज्ञान है" (13.10)। श्रीकृष्ण आगे कहते हैं, "मेरे प्रति निरन्तर अनन्य भक्ति, एकान्त स्थानों पर रहने की इच्छा, लौकिक समुदाय के प्रति विमुखता (13.11); आध्यात्मिक ज्ञान में स्थिरता और परम सत्य की तात्त्विक खोज, इन सबको मैं ज्ञान घोषित करता हूँ और जो भी इसके विपरीत है वह अज्ञान है” (13.12)। इनमें से कुछ स्वयं के बारे में हैं और बाकी बाहरी दुनिया के साथ हमारे संबंधों के बारे में हैं। 'मेरे जैसा कोई नहीं' की मनोदशा से ग्रसित कोई भी व्यक्ति विनम्रता को कमजोरी मानने लगता है। लेकिन श्रीकृष्ण विनम्रता को ज्ञान का प्रारंभिक बिंदु मानते हैं। विनम्रता न तो कमजोरी है और न ही लाचारी, बल्कि सर्वशक्तिमान अस्तित्व के साथ तालमेल बिठाने का एक तरीका है। अहंकार का अभाव ही विनम्रता है। स्वयं के साथ संतुष्ट रहना ज्ञान का एक अन्य पहलू है। ऐसा तब होता है जब हम अपने आप में केंद्रित होते हैं, जहां हमें इन्द्रिय विषयों की आवश्यकता नहीं होती है। जब इंद्रिय विषयों के प्रति वैराग्य हो जाता है, तो व्यक्ति स्वयं में केंद्रित रहता है, भले ही वह इंद्रिय विषयों या लोगों की भीड़ में विचर रहा हो। प्रिय और अप्रिय परिस्थितियों के प्रति समभाव ज्ञान का एक और पहलू है। अनुकूल परिस्थितियों में हम प्रसन्न होते हैं और कठिन परिस्थितियों का सामना होने पर तनावग्रस्त हो जाते हैं। समभाव प्राप्त करना ही उन दोनों को एक समान मानने का एकमात्र तरीका है। ऐसी अवस्था में बाहरी परिस्थितियाँ हमें प्रभावित करने की अपनी क्षमता खो देती हैं। ज्ञान के इन बीस पहलुओं को आत्मसात करना आध्यात्मिक ज्ञान को ‘जानने' से आध्यात्मिक ‘होने' की यात्रा है।

भगवद गीता के ग्यारहवें अध्याय के अंत में (11.55), श्रीकृष्ण कहते हैं कि उन तक केवल भक्ति के माध्यम से ही पहुंचा जा सकता है। इस प्रकार, भगवद गीता के श्रद्धेय बारहवें अध्याय को भक्ति योग कहा जाता है। श्रीकृष्ण के विश्वरूप को देखकर अर्जुन भयभीत हो गए और उन्होंने पूछा, "आपके साकार रूप पर दृढ़तापूर्वक निरन्तर समर्पित होने वालों को या आपके अव्यक्त निराकार रूप की आराधना करने वालों में से आप किसे योग में उत्तम मानते हैं" (12.1)? संयोगवश, सभी संस्कृतियों की जड़ें इसी प्रश्न में हैं। गीता में तीन व्यापक मार्ग दिये गये हैं। मन उन्मुख लोगों के लिए कर्म, बुद्धि उन्मुख के लिए सांख्य (जागरूकता) और हृदय उन्मुख के लिए भक्ति। ये अलग-अलग रास्ते नहीं हैं और उनके बीच बहुत सी आदान-प्रदान होती है और यही इस अध्याय में दिखता है। श्रीकृष्ण ने पहले एक पदानुक्रम दिया और कहा कि मन इंद्रियों से श्रेष्ठ है; बुद्धि मन से श्रेष्ठ है और बुद्धि से भी श्रेष्ठ आत्मा है (3.42)। श्रीकृष्ण ने यह भी कहा कि उन्हें केवल समर्पण के द्वारा न कि वेदों, अनुष्ठानों या दान के जरिये प्राप्त किया जा सकता है (11.53)। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि कोई व्यक्ति या तो कर्म-सांख्य का मार्ग जो लंबा है या समर्पण का एक छोटा मार्ग जो बहुत दुर्लभ है, के माध्यम से भक्ति तक पहुंचता है। भक्ति परमात्मा तक पहुंचने की अंतिम सीढ़ी है। भक्ति हमारी इच्छाओं को पूरा करने या कठिनाइयों को दूर करने के लिए हमारे द्वारा किए जाने वाले प्रार्थनाओं, अनुष्ठानों या जप से परे है। यह एक साथ निमित्तमात्र और श्रद्धावान दोनों होना है। जब अनुकूल और प्रतिकूल घटनाएं हमारे माध्यम से घटित होती हैं, यह एहसास करना है कि हम ईश्वर के हाथों के केवल एक उपकरण हैं अर्थात निमित्तमात्र हैं। हमारे जीवन में हमें जो कुछ भी मिलता है या जो कुछ भी होता है उसे परमात्मा के आशीर्वाद के रूप में स्वीकार करना ही श्रद्धा है, चाहे वह हमें पसंद हो या नहीं। यह बिना शर्त प्यार है जिसे श्रीकृष्ण ने स्वयं को दूसरों में और दूसरों को स्वयं में देखने और उन्हें हर जगह देखने की अवस्था के रूप में वर्णित किया है (6.29)।

मानसिक अस्पताल में काम करने वाला एक डॉक्टर अपने एक दोस्त को अस्पताल दिखाने ले गया। उसके दोस्त ने एक कमरे में एक आदमी को एक महिला की तस्वीर के साथ देखा और डॉक्टर ने बताया कि वह आदमी उस महिला से प्यार करता था और जब वह उससे शादी नहीं कर सका तो मानसिक रूप से अस्थिर हो गया। अगले कमरे में, उसी महिला की तस्वीर के साथ एक और आदमी था और डॉक्टर ने बताया कि उससे शादी करने के बाद वह मानसिक रूप से अस्थिर हो गया था। यह विडम्बना से भरी हुई कहानी बताती है कि पूर्ण और अपूर्ण इच्छाओं के एक जैसे विनाशकारी परिणाम कैसे हो सकते हैं। अर्जुन के साथ भी यही हुआ। भगवद गीता के ग्यारहवें अध्याय 'विश्वरूप दर्शन योग' के प्रारंभ में, वह श्रीकृष्ण का विश्वरूप देखना चाहते थे। लेकिन जब उन्होंने श्रीकृष्ण के विश्वरूप को देखा तो वह भयभीत हो गए। चिंतित अर्जुन अब श्रीकृष्ण को उनके मानव रूप में देखने की इच्छा प्रकट करते हैं। इसी तरह, जीवन में हमारा लक्ष्य समय के साथ बदलता रहता है। श्रीकृष्ण अपना विश्वरूप दिखाते हैं जिसमें अर्जुन देखते हैं कि उसके सभी शत्रु मृत्यु के मुंह में प्रवेश कर रहे हैं। श्रीकृष्ण उन्हें बताते हैं कि अर्जुन सिर्फ एक निमित्त मात्र (उनके हाथ में एक उपकरण) हैं और उनको बिना तनाव के लड़ने के लिए कहते हैं। अंत में, श्रीकृष्ण कहते हैं कि इस रूप को वेद,दान या अनुष्ठान के माध्यम से नहीं देखा जा सकता है, बल्कि केवल भक्ति के माध्यम से ही कोई व्यक्ति उनतक पहुँच सकता है। अज्ञानी स्तर पर, व्यक्ति भौतिक संपत्ति के संचय का सहारा लेता है। जब जागरूकता की किरण आती है, तो व्यक्ति पुण्य जैसा कुछ उच्च प्राप्त करने के लिए दान करना शुरू कर देता है, जो आमतौर पर मृत्यु के बाद स्वर्ग जाने के लिए होता है। जब श्रीकृष्ण कहते हैं कि दान मदद नहीं कर सकता, तो वे दान, वेद, अनुष्ठान से आगे बढ़ने और भक्ति के माध्यम से उन तक पहुंचने की सलाह दे रहे हैं। यह अगले स्तर तक पहुंचने के लिए एक सीढ़ी की तरह है। दान, वेद और कर्मकाण्ड सीढ़ी के चरण हैं, पर मंजिल नहीं। उन तक पहुंचने के लिए अंतिम चरण के रूप में भक्ति से गुजरना पड़ता है।

श्रीकृष्ण कहते हैं, "मेरे इस विराट रूप को तुमसे पहले किसी ने नहीं देखा है (11.47)। मेरा यह विराट रूप न तो वेदों के अध्ययन से, न यज्ञों से, न दान से,न कर्मकाण्डों से और न ही कठोर तपस्या से देखा जा सकता है (11.48)। भयमुक्त और प्रसन्नचित्त होकर मेरे इस पुरुषोत्तम रूप को फिर से देखो" (11.49)। श्रीकृष्ण अपने मानव स्वरूप में आ जाते हैं (11.50) और अर्जुन का चित्त स्थिर हो जाता है (11.51)। श्रीकृष्ण कहते हैं, "मेरे इस रूप को देख पाना अति दुर्लभ है। स्वर्ग के देवता भी इस रूप के दर्शन की आकांक्षा करते हैं (11.52)। मेरे इस रूप को न तो वेदों के अध्ययन, न ही तपस्या, दान और यज्ञों जैसे साधनों द्वारा देखा जा सकता है" (11.53)। हमारी सामान्य धारणा यह है कि दान से हमें पुण्य मिलता है। लेकिन श्रीकृष्ण कहते हैं कि दान हमें उनके विश्वरूप को देखने में मदद नहीं कर सकता। जब दान अहंकार से प्रेरित होता है, तो यह पुण्य, नाम, दिल की तसल्ली आदि पाने के लिए अपना कुछ देने का व्यवसाय बन जाता है। यह व्यापार हमें परमात्मा तक नहीं ले जा सकता क्योंकि उन्हें खरीदा नहीं जा सकता। तुरंत, श्रीकृष्ण एक सकारात्मक मार्ग सुझाते हुए कहते हैं, "लेकिन केवल एकनिष्ठ भक्ति से मुझे इस तरह देखा जा सकता है (11.54) और जो मेरे प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं, मुझे सर्वोच्च मानकर वह मेरे प्रति समर्पित हैं, आसक्ति से मुक्त हैं, किसी भी प्राणी से द्वेष नहीं रखते हैं, ऐसे भक्त निश्चित रूप से मुझे प्राप्त करते हैं" (11.55)। आसक्ति से मुक्त होने का अर्थ विरक्ति नहीं है। यह न तो घृणा है और न ही लालसा। पहले भी, श्रीकृष्ण ने हमें घृणा छोड़ने की सलाह दी थी न कि कर्म। कुंजी किसी भी प्राणी के प्रति शत्रुता छोड़ना है। घृणा, अहंकार की तरह है, और दोनों के कई आकार, चेहरे, रूप और अभिव्यक्तियाँ होती हैं जिसके कारण इन्हें पहचानना मुश्किल हो जाता है। घृणा एक जहर की तरह है, जिसे हम ढ़ोते हैं, जो अंततः हमें चोट और क्षति पहुंचाएगा। दूसरे शब्दों में, दुःख की स्थिति से आनंद की ओर बढ़ने के लिए घृणा का त्याग करना आवश्यक है।

अर्जुन ने भय से कांपते हुए अपने दोनों हाथों को जोड़कर श्रीकृष्ण को नमस्कार किया और इस प्रकार कहा (11.35), "संसार आपकी स्तुति में प्रसन्न और आनंदित है, राक्षस भयभीत होकर भाग रहे हैं और सिद्ध पुरुष आपको नमन कर रहे हैं (11.36) चूँकि आप ब्रह्मा की उत्पत्ति के कारण हैं, देवों के देव हैं, ब्रह्मांड के निवास हैं। आप अविनाशी हैं, व्यक्त और अव्यक्त से परे हैं, आप सर्वोच्च हैं (11.37)। आप ही सर्वज्ञाता और जो कुछ भी जानने योग्य है वह सब आप ही हो। आप ही परम धाम हो। हे अनंत रूपों के स्वामी! केवल आप ही समस्त ब्रह्माण्ड में व्याप्त हो" (11.38)। अर्जुन कहते हैं कि आप ही वायु, यम (मृत्यु के देवता), अग्नि और वरुण (समुद्र देवता) हैं (11.39), और बार-बार नमस्कार करते हैं (11.40)। वह आगे कहते हैं, "आप समस्त चर-अचर के स्वामी और समस्त ब्रह्माण्डों के जनक हैं। तीनों लोकों में आपके समतुल्य कोई नहीं है, और न आपसे बढ़कर कोई है" (11.43)। अर्जुन झुककर, उनको साष्टांग प्रणाम करते हुए उनकी कृपा चाहते हैं,जैसे एक पुत्र अपने पिता से, एक प्रेमिका अपने प्रेमी से और एक मित्र दूसरे मित्र से कृपा चाहते हैं (11.44)। जो पहले नहीं देखा था (विश्वरूप) उसे देखकर अर्जुन प्रसन्न होता है और साथ ही, उसका मन भय से भर जाता है और दया चाहता है (11.45)। वह श्रीकृष्ण को उनके मानव रूप में देखने की प्रार्थना करता है (11.46)। जबकि अर्जुन ने तीन रिश्तों का उल्लेख किया है; पिता-पुत्र, मित्र-मित्र और प्रेमी-प्रेमिका; किसी भी स्वस्थ रिश्ते के लिए शालीनता की आवश्यकता होती है और सभी संस्कृतियां यही कहती हैं। लंबे समय तक चलने के लिए रिश्तों में शालीनता एक आवश्यक तत्व है और समकालीन साहित्य इस दिशा में हमारा मार्गदर्शन करता है, विशेष रूप से विवाह और परिवार के संदर्भ में। शालीनता रिश्तों में दूसरों को माफ करने की क्षमता है, यह जानकर कि हम भी वैसी गलतियाँ कर सकते हैं और दूसरों के प्रति करुणा रखने की बात है। यह करुणा का भाव तब आता है जब समत्व को गहराई से आत्मसात किया जाता है, जब हम प्रशंसा और आलोचना के द्वंद्व को पार कर जाते हैं, जब हम स्वयं को दूसरों में और दूसरों को स्वयं में देखते हैं जो हमें भिन्नताओं को अपनाने में मदद करता है।

विभिन्न संस्कृतियाँ परमात्मा का वर्णन अलग-अलग तरीके से करती हैं। हमारी आस्था के आधार पर परमात्मा का स्वरूप बदलता रहता है। अगर परमात्मा हमारे सामने किसी अलग आकार या रूप में प्रकट होते हैं तो उन्हें पहचान पाना कठिन होगा। इसी तरह अर्जुन शुरू से श्रीकृष्ण के साथ मित्र की तरह व्यवहार कर रहे थे। जब तक अर्जुन ने विश्वरूप को नहीं देखा तब तक वह नहीं पहचान सके कि श्रीकृष्ण परमात्मा हैं। वह क्षमा मांगते हुए कहते हैं कि "आपको अपना मित्र मानते हुए मैंने धृष्टतापूर्वक आपको हे कृष्ण, हे यादव, हे प्रिय मित्र कहकर संबोधित किया क्योंकि मुझे आपकी महिमा का ज्ञान नहीं था। उपेक्षित भाव से और प्रेमवश होकर यदि उपहास करते हुए मैंने कई बार खेलते हुए,विश्राम करते हुए, बैठते हुए, खाते हुए, अकेले में या अन्य लोगों के समक्ष आपका कभी अनादर किया हो तो उन सब अपराधों के लिए मैं आपसे क्षमा याचना करता हूँ" (11.41-11.42)। अर्जुन की तरह हमारे साथ भी ऐसा ही होगा। जब हम समर्पण की उस शाश्वत अवस्था तक पहुँचते हैं, तो हमें एहसास होता है कि हर कोई उसी परमात्मा का हिस्सा है। हरेक व्यक्ति, पशु या वृक्ष परमात्मा बन जायेंगे,चाहे वे इसके बारे में जानते हों अथवा नहीं। उनके साथ हमारा पिछला व्यवहार भद्दा लगेगा और अर्जुन की तरह माफी मांगने के अलावा कोई रास्ता नहीं है। कई संस्कृतियां स्वतंत्रता की इस शाश्वत स्थिति को प्राप्त करने के लिए क्षमा मांगने, कृतज्ञता व्यक्त करने और साष्टांग प्रणाम करने का उपदेश देती हैं और अभ्यास कराती हैं। श्रीमद्भागवत के ग्यारहवें अध्याय में श्रीकृष्ण और उनके बचपन के मित्र उद्धव के बीच एक लंबी वार्तालाप है। बातचीत के अंत में, उद्धव मोक्ष प्राप्त करने के लिए एक आसान मार्ग बताने का अनुरोध करते हैं। श्रीकृष्ण उत्तर देते हैं,‘एक चोर, गधे या शत्रु को उसी तरह साष्टांग प्रणाम करो जैसे तुम मुझे साष्टांग प्रणाम करते हो'। यह मार्ग समझने में बहुत आसान है लेकिन इसका आचरण करना बहुत कठिन है। यह वैसा ही है जब श्रीकृष्ण ने कहा था 'सभी प्राणियों को स्वयं में महसूस करो; सभी प्राणियों में स्वयं को देखो और हर जगह उन्ही (परमात्मा) को देखो' (6.29) जिसे घृणा को त्यागकर आसानी से प्राप्त किया जा सकता है (5.3)।

श्रीकृष्ण अर्जुन को भविष्य की एक झलक दिखाते हैं जहां योद्धा मौत के मुंह में प्रवेश कर रहे हैं और कहते हैं कि अर्जुन केवल एक निमित्तमात्र है। श्रीकृष्ण आगे स्पष्ट करते हैं कि अर्जुन के बिना भी, उनमें से कोई भी जीवित नहीं रहेगा और इसलिए उसे तनाव मुक्त होकर लड़ना चाहिए। 'इंद्रिय केंद्रित' अहंकार से 'परमात्मा केंद्रित' निमित्तमात्र तक की यात्रा कठिन है। स्वाभाविक प्रश्न हैं कि इसे कैसे हासिल किया जाए और इसकी प्रगति के सूचक क्या हैं। निमित्तमात्र एक आंतरिक अवस्था है न कि कोई कौशल जिसमें महारत हासिल की जा सके। इसे प्राप्त करने का एक आसान तरीका मृत्यु को सदैव याद रखना है, जिसे 'मेमेंटो मोरी' कहा जाता है। दूसरे, दर्दनाक (असहाय और दयनीय) परिस्थितियां हमें निमित्तमात्र की झलक तुरंत दे सकती हैं। जागरूकता के साथ सुखद परिस्थितियां भी हमें लंबे समय तक चलने वाली निमित्तमात्र की झलक दे सकती हैं। श्रीकृष्ण ने पहले संकेत दिया था कि वह 'तेज' हैं (10.41) और यह एहसास करना है कि निमित्तमात्र की आंतरिक स्थिति बाहरी दुनिया में तेज के रूप में प्रकट होती है। यह स्थिति हमें पूर्वाग्रहों, विश्वास प्रणालियों या निर्णयों के बिना चीजों को स्पष्ट रूप से देखने और अतीत के बोझ या भविष्य अथवा दूसरों से अपेक्षाओं के बिना जीने में मदद करती है। 'क्या हमारी अनुपस्थिति से इस संसार पर कोई फर्क पड़ेगा'? यदि हम इस प्रश्न का उत्तर बार-बार, स्पष्ट रूप से और दृढ़ता से 'नहीं' में पाते हैं, तो हम निश्चित रूप से निमित्तमात्र की ओर बढ़ रहे हैं।यह इस बारे में नहीं है कि हम क्या करते हैं या हम क्या चुनते हैं, भले ही वह कितना ही महान क्यों न प्रतीत हो। यह इस बारे में है कि हमारे द्वारा किए गए कर्म या चुनाव कितना कर्मबंधन उत्पन्न करते हैं। यह कर्मबंधन निमित्त-मात्र की ओर हमारी यात्रा में प्रगति को निर्धारित करता है।

ਬ੍ਰਹਮੰਡ ਦੇ ਨਿਰਮਾਣ ਦੇ ਸ਼ੁਰੂਆਤੀ ਦੌਰ ਵਿੱਚ ਇਹ ਸਿਰਫ ਊਰਜਾ ਸੀ ਅਤੇਇਸ ਨੇ ਬਾਦ ਵਿੱਚ ਪਦਾਰਥ ਦਾ ਰੂਪ ਧਾਰਨ ਕੀਤਾ। ਵਿਗਿਆਨਕ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਇਹ ਸਵੀਕਾਰ ਕੀਤਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਕਿ ਬ੍ਰਹਮੰਡ ਵਿੱਚ ਤਾਪਮਾਨ, ਘਣਤਾ ਅਤੇ ਮੈਟਰ-ਐਂਟੀਮੈਟਰ ਦੇ ਅਨੁਪਾਤ ਵਿੱਚ ਸੂਖਮ (ਕਵਾਂਟਮ) ਭਿੰਨਤਾ ਸੀ ਅਤੇ ਇਨ੍ਹਾਂ ਭਿੰਨਤਾਵਾਂ ਦਾ ਕੋਈ ਵਿਗਿਆਨਕ ਕਾਰਨ ਨਹੀਂ ਹੈ। ਇਹ ਪ੍ਰਸਥਿਤੀਆਂ ਹੀ ਪਦਾਰਥ ਦੇ ਨਿਰਮਾਣ ਲਈ ਜ਼ਿੰਮੇਵਾਰ ਹਨ ਅਤੇ ਵਿਗਿਆਨ ਇਸ ਗੱਲ ਨਾਲ ਸਹਿਮਤ ਹੈ ਕਿ ਅੱਜ ਅਸੀਂ ਆਪਣੇ ਚਾਰੇ ਪਾਸੇ ਜੋ ਵਿੰਭਨਤਾਵਾਂ ਵੇਖਦੇ ਹਾਂ, ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਬਣਾਉਣ ਲਈ ਭਗਵਾਨ ਪਾਸਾ (ਚੌਪੜ) ਖੇਡ੍ਹਦੇ ਹਨ। ਇਸ ਸੰਬੰਧ ਵਿੱਚ ਸ੍ਰੀ ਕਿ੍ਰਸ਼ਨ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ ਕਿ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਨਿਮਨ (ਹੇਠਲੀ) ਪ੍ਰਕਿ੍ਰਤੀ ਅਸ਼ਟਾਂਗੀ (ਅੱਠ ਤਰ੍ਹਾਂ ਦੀ) ਹੈ। ਅੱਗ, ਪਿ੍ਰਥਵੀ, ਜਲ, ਵਾਯੂ ਅਤੇ ਆਕਾਸ਼ ਭੌਤਿਕ (ਪਦਾਰਥਕ) ਸੰਸਾਰ ਲਈ ਹਨ ਅਤੇ ਮਨ, ਬੁੱਧੀ ਤੇ ਹੰਕਾਰ ਜੀਵਾਂ ਲਈ ਹਨ (7.4)। ਅਗਨੀ ਦਾ ਅਰਥ ਉਸ ਊਰਜਾ ਤੋਂ ਹੈ ਜੋ ਆਦਿ ਕਾਲ ਤੋਂ ਮੌਜੂਦ ਹੈ। ਊਰਜਾ ਪਦਾਰਥ ਵਿੱਚ ਪ੍ਰਵਰਤਿਤ ਹੋਈ ਜਿਸ ਵਿੱਚ ਇਕ ਠੋਸ ਅਵਸਥਾ (ਪਿ੍ਰਥਵੀ) ਤਰਲ ਅਵਸਥਾ (ਜਲ) ਅਤੇ ਗੈਸ-ਅਵਸਥਾ (ਹਵਾ) ਹੈ। ਇਨ੍ਹਾਂ ਸਾਰਿਆ ਨੂੰ ਰੱਖਣ ਲਈ ਜਗ੍ਹਾ ਜਾਂ ਆਕਾਸ਼ ਦੀ ਲੋੜ ਸੀ।ਜੀਵਾਂ ਦੇ ਮਾਮਲੇ ਵਿੱਚ, ਜੀਵਤ ਰਹਿਣ ਲਈ, ਉਨ੍ਹਾਂ ਵਿੱਚ ਇਕ ਭੇਦ ਕਰਨ ਵਾਲੀ ਪ੍ਰਣਾਲੀ ਦੀ ਲੋੜ ਹੰੁਦੀ ਹੈ। ਮਨ, ਸੋਚ ਦਾ ਬੁਨਿਆਦੀ ਪੱਧਰ ਹੈ (ਪ੍ਰਣਾਲੀ-1 ਤੇਜ਼ ਤੇ ਅੰਤਰ ਗਿਆਨ ਦੁਆਰਾ ਸਾਖਿਅਤ) ਅਤੇ ਬੁੱਧੀ ਉੱਚੇ ਪੱਧਰ ਦੀ ਸੋਚ ਹੈ (ਪ੍ਰਣਾਲੀ-2, ਧੀਮੀ ਅਤੇ ਚਿੰਤਨਸ਼ੀਲ)। ਅਹੰਕਾਰ, ਆਖਰੀ ਰੁਕਾਵਟ ਹੈ, ਜਿਸ ਨੂੰ ਸਾਨੂੰ ਪ੍ਰਮਾਤਮਾ ਦੀ ਉੱਚ ਪ੍ਰਕਿਰਤੀ ਤੱਕ ਪੁੱਜਣ ਲਈ ਪਾਰ ਕਰਨਾ ਹੈ। ਸ੍ਰੀ ਕਿ੍ਰਸ਼ਨ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ ਕਿ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਉੱਚ ਪ੍ਰਕਿਰਤੀ ਜੀਵਨ ਤੱਤ ਹੈ ਜੋ ਬ੍ਰਹਮੰਡ ਨੂੰ ਸਹਾਰਾ ਦਿੰਦੀ ਹੈ (7.5), ਜਿਵੇਂ ਇਕ ਅਦਿੱਖ ਸੂਤਰ ਮਣਕਿਆਂ ਨੂੰ ਬੰਨ੍ਹ ਕੇ ਰੱਖਦਾ ਹੈ (7.7)।ਸ੍ਰੀ ਕਿ੍ਰਸ਼ਨ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ, ‘‘ਹਜ਼ਾਰਾਂ ਮਨੁੱਖਾਂ ਵਿਚੋਂ ਕੋਈ ਇੱਕ ਹੀ ਮੇਰੀ ਪ੍ਰਾਪਤੀਲਈ ਜਤਨ ਕਰਦਾ ਹੈ ਅਤੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਜਤਨ ਕਰਨ ਵਾਲੇ ਯੋਗੀਆਂ ਵਿਚੋਂ ਵੀ ਕੋਈ ਇੱਕ ਅੱਧਾ ਹੀ ਮੇਰੇ ਯਥਾਰਥ ਨੂੰ ਪਹੰੁਚਦਾ ਹੈ'' (7.3)। ਇਸ ਦਾ ਅਰਥ ਇਹ ਹੈ ਕਿ ਹੰਕਾਰ ਦੀ ਰੁਕਾਵਟ ਨੂੰ ਪਾਰ ਕਰਨਾ ਇਕ ਔਖਾ ਕਾਰਜ ਹੈ, ਅਤੇ ਇਥੇ ਉਸੇ ਦਾ ਸੰਕੇਤ ਦਿੱਤਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ।ਇਸ ਨੂੰ ਵੇਖਣ ਦਾ ਇਕ ਹੋਰ ਢੰਗ ਇਹ ਹੈ ਕਿ ਅਸੀਂ 13.8 ਅਰਬ ਸਾਲਾਂ ਦੀਕਰਮਗਤ ਉੱਨਤੀ ਦੀ ਯਾਤਰਾ ਦੌਰਾਨ ਜਾਣੇ-ਅਣਜਾਣੇ ਵਿੱਚ ਬਹੁਤ ਸਾਰੀ ਧੂੜ-ਮਿੱਟੀ ਇਕੱਠੀ ਕਰ ਲਈ। ਸਾਡਾ ਪਹਿਲਾ ਕਦਮ ਇਸ ਧੂੜ-ਮਿੱਟੀ ਦੇ ਬਾਰੇ ਵਿੱਚ ਜਾਗਰੂਕ ਹੋਣਾ ਹੈ ਜੋ ਹੰਕਾਰ ਦੇ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਪ੍ਰਗਟ ਹੰੁਦੀ ਹੈ, ਅਤੇ ਦੂਜਾ ਕਦਮ ਇਸ ਤੋਂ ਛੁਟਕਾਰਾ ਪਾਉਣਾ ਹੈ।

अर्जुन देखता है कि सभी योद्धा श्रीकृष्ण के विश्वरूप के दांतों से चूर्ण हो रहे हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि ये सभी योद्धा मेरे द्वारा मारे जा चुके हैं और तुम केवल निमित्त-मात्र हो (11.33) और इसलिए व्यथित महसूस किए बिना युद्ध करो (11.34)। भले ही अर्जुन के शत्रु उनके द्वारा पहले ही मारे जा चुके हों, फिर भी श्रीकृष्ण ने अर्जुन को युद्ध छोड़ने के लिए नहीं कहा। इसके बजाय, वह उसे बिना तनाव के लड़ने के लिए कहते हैं। स्पष्ट संकेत यह है कि निमित्त-मात्र का अर्थ निष्क्रियता नहीं है। निष्क्रियता एक किस्म का दमन है जो आंतरिक तनाव पैदा करता है। यदि अर्जुन शारीरिक रूप से भी युद्ध छोड़ देते तो भी युद्ध नहीं रुकता बल्कि वे जहां भी जाते, मानसिक रूप से युद्ध का बोझ ढोते। दूसरी ओर, श्रीकृष्ण मानसिक रूप से इस बोझ को त्यागने और हाथ में जो कर्म है उसे परमात्मा के साधन के रूप में करने का संकेत देते हैं। यह सक्रिय स्वीकृति हमारे दैनिक जीवन के कभी न समाप्त होने वाले तनाव को कम करने का सबसे अच्छा तरीका है। उदाहरण के लिए, एक बिजली का तार बिजली का संचालन करके एक बल्ब को सक्रिय करता है जो प्रकाश देता है। तार के सोचने के दो तरीके हो सकते हैं। एक तो यह कि अहंकार से भर जाए क्योंकि यह बल्ब को बिजली दे रहा है। दूसरा वह ऐसा भी सोच सकता है कि वह सिर्फ एक निमित्त-मात्र है जहां टरबाइन द्वारा बिजली उत्पन्न की जाती है और बल्ब प्रकाश दे रहा है। यह सच है कि जब वोल्टेज में अंतर होता है, तो तार के पास बिजली प्रवाहित करने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता है। इसी प्रकार, वोल्टेज में अंतर की तरह, तीन गुण हमारे कार्यों के लिए जिम्मेदार हैं। निमित्त-मात्र वह है जो जानता है कि तीन गुण ही वास्तविक कर्ता हैं। अपने आप को निमित्त-मात्र के रूप में महसूस करने के बजाय, परमात्मा को निमित्त-मात्र या एक उपकरण बनाने की हमारी सामान्य प्रवृत्ति होती है। हम उम्मीद करते हैं कि हमारी इच्छाओं को पूरा करने के लिये परमात्मा उपकरण बनकर हमारा काम करें। मुख्य बात यह महसूस करना है कि हम इस शक्तिशाली रचना के अरबों उपकरणों में से एक हैं।

ਸ੍ਰੀ ਕਿ੍ਰਸ਼ਨ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ, ‘‘ਮੈਂ ਤੈਨੂੰ ਗਿਆਨ ਤੇ ਬੁੱਧੀ (ਸਿਆਣਪ) ਦੇ ਬਾਰੇ ਵਿੱਚਸਮਝਾਵਾਂਗਾ। ਜਦੋਂ ਤੂੰ ਇਸ ਨੂੰ ਸਮਝ ਜਾਵੇਂਗਾ ਤਾਂ ਇਸ ਤੋਂ ਅੱਗੇ ਇਸ ਸੰਸਾਰ ਵਿੱਚ ਸਮਝਣ ਯੋਗ ਕੁਝ ਵੀ ਨਹੀਂ ਰਹਿੰਦਾ'' (7.2)। ਗਿਆਨ ਤੇ ਬੁੱਧੀ ਹੀ ਇਕ ਉਹ ਮਾਰਗ ਹੈ ਜਿਹੜਾ ਮਨ ਨੂੰ ਜਿੱਤਣ ਵਾਲੇ ਭਗਤ ਲੋਕਾਂ ਲਈ ਢੁਕਵਾਂ ਹੈ। ਇਸ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਸ੍ਰੀ ਕਿ੍ਰਸ਼ਨ ਨੇ ਆਪਣੇ ਦਿਲ ਦੀ ਮੰਨਣ ਵਾਲੇ ਭਗਤ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ, ‘‘ਖੁਦ ਵਿੱਚ ਸਾਰੇ ਪ੍ਰਣੀਆਂ ਨੂੰ ਤੇ ਸਾਰੇ ਪ੍ਰਾਣੀਆਂ ਵਿੱਚ ਖੁਦ ਨੂੰ ਵੇਖਣ ਅਤੇ ਹਰ ਥਾਂ ਤੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਦੇਖਣਾਂ'' ਦਾ ਮਾਰਗ ਸੁਝਾਇਆ ਸੀ (6.29)। ਜੋ ਇਸ ਨੂੰ ਜਾਣ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਤਾਂ ਉਸ ਦੇ ਹੋਰ ਜਾਣਨ ਲਈ ਕੁਝ ਵੀ ਨਹੀਂ ਬਚਦਾ।ਵਰਤਮਾਨ ਦਾ ਵਿਗਿਆਨਕ ਨਿਚੋੜ ਇਹ ਹੈ ਕਿ ਸਿਫਰ ਤੋਂ ਸਾਰੇ ਬ੍ਰਹਮੰਡ ਦੀਸਿਰਜਣਾ ਹੰੁਦੀ ਹੈ। ਸਾਡਾ ਵਿਸਥਾਰ ਕਰਦਾ ਹੋਇਆ ਇਹ ਬ੍ਰਹਮੰਡ 13.8 ਅਰਬ ਸਾਲ ਪਹਿਲਾਂ ਇਕ ਬਿੱਗ ਬੈਂਗ (big bang) ਵਿੱਚ ਬਣਿਆ ਸੀ।ਕਾਜ਼ਮਿਕ ਮਾਈਕਰੋਵੇਵ ਬੈਕਗਰਾਊਂਡ ਰੇਡੀਏਸ਼ਨ (CMBR) ਦਾ ਹਵਾਲਾ ਦਿੰਦੇ ਹੋਏ ਇਹ ਤਰਕ ਸਿਰਜਿਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਕਿ ਵਰਤਮਾਨ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਵੀ ਇਕ ਬ੍ਰਹਮੰਡ ਸੀ। ਅਜਿਹਾ ਵੀ ਅਨੁਮਾਨ ਲਾਇਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਕਿ ਕੁਝ ਸਮੇਂ ਬਾਦ ਇਹ ਬ੍ਰਹਮੰਡ ਫੈਲ ਕੇ ਤਿਤਰ ਬਿਤਰ ਹੋ ਕੇ ਸਿਫਰ ਦੇ ਬਰਾਬਰ ਹੋ ਜਾਵੇਗਾ ਅਤੇ ਖਾਲੀ ਥਾਂ ਵਾਲੀ ਊਰਜਾ ਇਕ ਹੋਰ ਬ੍ਰਹਮੰਡ ਦਾ ਨਿਰਮਾਣ ਕਰੇਗੀ। ਇਸ ਦਾ ਅਰਥ ਇਹ ਹੈ ਕਿ ਇਹ ਸਿਰਜਣ ਤੇ ਪਰਲੋ ਦੀ ਇਕ ਚੱਕਰਵਾਤੀ ਪ੍ਰਕਿਰਿਆ ਹੈ।ਇਹ ਪਿੱਠਭੂਮੀ ਸਾਨੂੰ ਇਹ ਸਮਝਣ ਵਿੱਚ ਮੱਦਦ ਕਰਦੀ ਹੈ, ਜਦੋਂ ਸ੍ਰੀ ਕਿ੍ਰਸ਼ਨਕਹਿੰਦੇ ਹਨ, ਕਿ ‘‘ਉਹ ਪੂਰੇ ਬ੍ਰਹਮੰਡ ਦੀ ਉਤਪਤੀ ਤੇ ਪਰਲੋ ਹੈ'' (7.6)। ਪਹਿਲਾ ਸੰਕੇਤ ਇਹ ਹੈ ਕਿ ਇਹ ਇਕ ਚੱਕਰਦਾਰ ਪ੍ਰਕਿਰਿਆ ਹੈ। ਦੂਜਾ ਕਿ ਸਿ੍ਰਸ਼ਟੀ ਸਿਰਜਣ ਤੇ ਵਿਨਾਸ ਦੋਹਾਂ ਵਿੱਚ ਏਕਤਾ ਹੈ। ਧਿਆਨ ਦੇਣ ਯੋਗ ਗੱਲ ਇਹ ਹੈ ਕਿ ਹਰ ਇਕਸੱਭਿਆਚਾਰ ਵਿੱਚ ਭਗਵਾਨ ਨੂੰ ਇਹ ਸਿ੍ਰਸ਼ਟੀ ਕਰਤਾ ਦੇ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਮੰਨਿਆ ਹੈ। ਪਰ ਪ੍ਰਮਾਤਮਾ ਦੇ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਸ੍ਰੀ ਕਿ੍ਰਸ਼ਨ ਘੋਸ਼ਣਾ ਕਰਦੇ ਹਨ ਕਿ ਉਹ ਸਿ੍ਰਸ਼ਟੀ ਕਰਤਾ ਦੇ ਨਾਲ ਨਾਲ ਵਿਨਾਸ਼ਕਾਰੀ ਜਾਂ ਅਘਾਤਕ ਵੀ ਹਨ। ਉਹ ਅੱਗੇ ਦੱਸਦੇ ਹਨ, ‘‘ਮੇਰੇ ਤੋਂ ਬਗੈਰ ਦੂਜਾ ਕੋਈ ਵੀ ਪਰਮ ਕਾਰਨ ਨਹੀਂ ਹੈ।ਇਹ ਸੰਪੂਰਣ ਜਗਤ ਸੂਤਰ ਵਿੱਚ ਸੂਤਰ ਦੀਆਂ ਮਣੀਆਂ (ਮਣਕੇ) ਵਾਂਗੂੰ ਮੇਰੇ ਵਿੱਚ ਪਰੋਇਆ ਹੋਇਆ ਹੈ'' (7.7)। ਪ੍ਰਗਟ (ਮਣੀ) ਅਤੇ ਅਪ੍ਰਗਟ (ਸੂਤਰ) ਨੂੰ ਸਮਝਾਉਣ ਲਈ ਅਕਸਰ ਮਣਕਿਆਂ ਦੀ ਮਾਲਾ ਦੇ ਉਦਾਹਰਨ ਦੀ ਵਰਤੋਂ ਕੀਤੀ ਜਾਂਦੀ ਹੈ। ਸੂਤਰ ਅਦਿੱਖ (ਅਦ੍ਰਿਸ਼) ਹੈ ਅਤੇ ਸੂਤਰ ਦੀ ਸਹਾਇਤਾ ਤੋਂ ਬਿਨਾ ਮਣਕੇ ਕੋਈ ਸੁੰਦਰ ਮਾਲਾ (ਗਹਿਣਾ) ਨਹੀਂ ਬਣ ਸਕਦੇ। ਇਹ ਉਸ ਦਰਖਤ ਦੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਹੈ ਜੋ ਅਦਿੱਖ ਜੜਾਂ ਤੋਂ ਬਗੈਰ ਜੀਵਤ ਨਹੀਂ ਰਹਿ ਸਕਦਾ। ਬ੍ਰਹਮੰਡ ਵੀ ਪ੍ਰਮਾਤਮਾ ਦੇ ਬਿਨਾਂ ਮੌਜੂਦ ਨਹੀਂ ਹੋ ਸਕਦਾ।

विश्वरूप के दांतों के बीच सभी योद्धाओं को पिसते हुए देखकर, अर्जुन ने श्रीकृष्ण के बारे में विस्तार से जानने के लिए पूछा कि वह वास्तव में कौन हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि वह महाकाल हैं जो इस समय लोकों को नष्ट करने में प्रवृत्त हैं। तुम्हारे युद्ध में भाग नहीं लेने से भी युद्ध की व्यूह रचना में खड़े विरोधी पक्ष के सभी योद्धा मारे जाएंगे (11.32)। वह आगे कहते हैं कि तुम्हारे शत्रु मेरे द्वारा मारे जा चुके हैं और तुम केवल निमित्त-मात्र हो (11.33)। द्रोणाचार्य, भीष्म पितामह तथा अन्य योद्धा पहले ही मेरे द्वारा मारे जा चुके हैं,इसलिए तुम युद्ध करने के लिए व्यथित मत हो (11.34)। अर्जुन की व्यथा का मूल कारण उसकी यह धारणा है कि वर्तमान संदर्भ में वह कर्ता या मारने वाला है। यह अहम् कर्ता (मैं कर्ता हूँ) या अहंकार है। वह यह कहकर इसे उचित ठहराने की कोशिश करता है कि राज्य के लिए अपने शिक्षकों और रिश्तेदारों की हत्या करना उचित नहीं है। श्रीकृष्ण ने अर्जुन के भ्रम को तोड़ते हुए उसे भविष्य की एक झलक दिखाई जहां सभी योद्धा मौत के मुंह में प्रवेश कर रहे हैं। श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि अर्जुन के भाग नहीं लेने पर भी उनमें से कोई भी जीवित नहीं रहेगा और अर्जुन सिर्फ एक निमित्त-मात्र है। अहंकार के कारण हम खुद को कर्ता, उपलब्धि हासिल करने वाले, जानने वाले आदि समझते हैं। इसी अहंकार की वजह से हम दूसरों को भी कर्ता मानते हैं। इसके परिणामस्वरूप स्वयं से और दूसरों से अपेक्षाएं पैदा होती हैं जो अंततः दुःख का कारण बनती हैं। सर्वशक्तिमान के हाथों में एक उपकरण यानी निमित्त-मात्र होना कर्तापन के भाव के विपरीत है। श्रीकृष्ण ने शाश्वत अवस्था के लिए कई शब्दों का प्रयोग किया जैसे नित्यतृप्त, वीतराग जो राग और विराग से परे है, अनासक्ति जो आसक्ति और विरक्ति से परे है, कर्मफल की आशा किये बिना कर्म करना अदि। निमित्त-मात्र आनंद की उसी शाश्वत अवस्था का एक और नाम है। यदि भगवद गीता को एक शब्द में वर्णित किया जा सकता है तो वह निमित्त-मात्र है। अहंकार (संघर्ष) से निमित्त-मात्र (समर्पण) तक की यात्रा ही गीता का मूल सन्देश है। जब निमित्त-मात्र को गहरे स्तर पर आत्मसात किया जाता है तो कुछ भी गंभीर, तनावपूर्ण या डरावना नहीं रहता।